Tuesday, August 23, 2016

बिकिनी बनाम बुर्किनी

पूरे चौदह सौ साल बीत गये। बुर्के के आविष्कार के चौदह सौ साल बाद अब इस्लाम में औरतों के लिए एक नया आविष्कार हुआ है। बुर्किनी। थोड़ा बुर्का मिलाया गया और थोड़ा सा बिकनी। इस तरह से औरत को ऐतिहासिक आजादी देनेवाले बुर्किनी का निर्माण हो गया।

फ्रांस से आई इस खबर को देखकर अफाक खयाली की याद आ रही है जो आजकल कनाडा में रहते हैं। मां बाप इंडिया से पाकिस्तान गये और वो से जवानी में ही अमेरिका चले गये। वहां वे किताबों के एक स्टोर में काम करते थे। पहली बार जब उन्होंने प्लेब्वाय देखा तो मारे शर्म के लाल हो गये। खैर धीरे धीरे उन्होंने अनुभव किया कि यहां के लोगों के लिए यह सब आम बात है। एक इंटरव्यू में उन्होंने जिक्र किया कि एक बार उनके एक दोस्त किसी न्यूड बीच नामक जगह पर लेकर गये। वे बड़े हैरान हुए लेकिन माहौल देखकर इतने प्रसन्न हुए कि अक्सर वहां जाने लगे। फिर तीन चार बार जाने के बाद उन्हें लगा कि यहां आना टाइम की बर्बादी है। मन के भीतर जो इस्लामिक कुंठा भरी थी वह तीन चार बार में ही बाहर निकल गयी। फिर उन्होंने वहां जाना बंद कर दिया।

लेकिन पाकिस्तान से कोई आता तो वह उन्हें उस बीच पर ले जाने के जरूर कहता। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बड़ी खूबसूरत बात कही। उन्होंने बताया कि अब जैसे ही कोई पाकिस्तान से आता और वहां जाने की बात करता तो वे अपनी बीवी से कहते कि "बीमार आये हैं। इलाज के लिए लेकर जा रहे हैं।" यह उनका और उनकी पत्नी का कोडवर्ड होता था। बीमार कहने पर वे समझ जातीं थी कि कौन लोग आये हैं और वे कहां जा रहे हैं। यही वह बीमारी है जिसे मजहब के नाम पर ढंककर रखा जाता है।

बिकनी पहनकर बीच पर इसलिए नहीं जाते कि उन्हें अपने शरीर की नुमाइश करनी है। बल्कि इसलिए जाते हैं कि सर्द देशों में शरीर पर सूरज की ज्यादा से ज्यादा रोशनी पड़े। नहाते हैं तो शरीर की धुलाई सफाई हो। ये बुर्कीनी पहनकर जाएंगे तो बीच पर क्या पायेंगे?

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