Sunday, October 20, 2013

आप का सर्वे, आपकी सरकार

सिसरो एसोसिएट भी किसी नयी बला का ही नाम है जो भारत में लोकतंत्र को सुधारने की दिशा में काम करने के लिए नयी नयी मैदान में आई है। पिछले दो आम चुनावों से कारपोरेट अंदाज में पूंजीखोरी के लिए लोकतंत्र का भला करने का जो चलन शुरू हुआ यह उसी कड़ी में एक और नाम लगता है। इधर दो चुनावों से जब से यह जुमला ज्यादा प्रचलित हो चला है कि राजनीति सबसे बड़ा व्यापार है, कारपोरेट घरानों को नाना प्रकार के लोकतांत्रिक हित समझ में आने लगे हैं। सर्वे, ओपिनियन पोल, सोशल मीडिया पर ब्रांडिंग, कैम्पेन के नाना रूपों और रंगों को रंग रोगन करने जैसे कामों को लोकतंत्र और ओपिनियन मेकिंग के लिए जरूरी मानकर कारपोरेट कंपनियों की पहल पर लोकतंत्र का भला करने के लिए कुकुरमुत्तों की तरह सैकड़ों चुनावी दुकानें खुल गई हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता अब सिर्फ नारा लगाने के काम में शेष रह गये हैं। बाकी सारा काम धीरे धीरे इलेक्शन मैनेजमेन्ट के जिम्मे होता जा रहा है। लोकतंत्र को मजबूत करने का यह नया प्रयास लोकतंत्र को कितना कमजोर करेगा इसका अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है लेकिन अभी तो सिर्फ सिसरो एसोसिएट के जरिए उस आप की चर्चा जिसने अपने ही सर्वे में अपने आपको दिल्ली का सरताज घोषित कर दिया है।

सामान्य परिस्थिति में अगर यह सर्वे सामने आता तो खबर बनाने की बजाय शायद हम इस सर्वे की खबर लेते कि भला कौन सी ऐसी पार्टी है जो अपना सर्वे सार्वजनिक करे और यह न कहे कि उसकी सरकार नहीं बन रही है? अरविन्द केजरीवाल जिस सर्वे के हवाले से अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं वह उन्हीं की पार्टी द्वारा उन्हीं की चहेती कंपनी ने करवाया है जिसका नाम सिसरो एसोसिएट है। सिसरो एसोसिएट से कौन कौन जुड़ा है यह जानने जब हम उसकी वेबसाइट पर पहुंचे तो "प्रोफाइल" पेज अंडर कंस्ट्रक्शन था लेकिन योगेन्दर यादव खुद आगे आये हैं इसलिए इस बात की पूरी संभावना जताई जा सकती है कि सिसरो का कुछ न कुछ योगेन्दर कनेक्शन जरूर होना चाहिए। योगेन्दर सर्वे सिंडिकेट के बेताज सरताज हैं। सीएसडीएस में रहते हुए उन्होंने अपने सर्वेक्षणों के जरिए अभी तक कमोबेश सटीक नतीजे ही दिये हैं और सरताज के सर्वे नतीजों पर सबको कमोबेश भरोसा होता रहा है।

लेकिन सरताज के कहने पर भी सिसको के सर्वे पर एकबारगी भरोसा इसलिए नहीं हो रहा है कि यह उन्हीं के लिए उन्हीं के द्वारा उन्हीं का सर्वे है। सिसको के धनंजय जोशी या सुनीत माथुर वैसे भी इतने जाने पहचाने नाम नहीं है कि मनमानी रिजल्ट देने से पहले बहुत सोच विचार करें। इसे जनमत इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें थर्ड पार्टी इंटरवेन्शन (तीसरे पक्ष की सहभागिता) कहीं नहीं है। पार्टियों द्वारा जो आंतरिक सर्वे होते हैं उसके नतीजे तब भी सार्वजनिक नहीं किये जाते जबकि वे अपने ही द्वारा करवाये गये सर्वे में जीत रहे होते हैं। (विजय गोयल जैसे लोगों द्वारा प्रायोजित सर्वे की बात दूसरी है।) वैसी परिस्थिति में भी जीत जाने का दावा किया जाता है अपने ही द्वारा किये गये सर्वे का हवाला नहीं दिया जाता। क्योंकि यह लोकतंत्र के लिए सामान्य परिस्थिति नहीं है इसलिए अब हम सवाल उठाने की बजाय सवाल दबा रहे हैं। मामला मोदी और अरविन्द केजरीवाल से जुड़ा हो तो वैसे भी हमारे सारे सवाल बेमतलब और बेमानी हो जाते हैं।

जैसे प्रचार कंपनियों के जरिए मोदी पूरे देश में छा जाने की कोशिश कर रहे हैं कुछ कुछ उसी तर्ज पर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में अपने आपको स्थापित करने की कोशिश की है। कितने स्थापित हुए हैं यह तो वक्त बताएगा लेकिन उनकी ओर से कोशिश में कोई कमी नहीं है। यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने पार्टी सबसे बाद में बनाई लेकिन दिल्ली में टिकट का बंटवारा सबसे पहले शुरू किया। यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने दिल्ली के आटोरिक्शावालों के पिछवाड़े शीला दीक्षित को गाली देते हुए से पोस्टर लगवाये। उनके प्रचार अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह बना कि उन्होंने अपनी अच्छाइयों का प्रचार करने की बजाय शीला दीक्षित की बुराइयों का घोषित प्रचार शुरू किया। पोस्टर बैनर लगाकर। दिल्ली की राजनीति में अरविन्द केजरीवाल के कुछ दुस्साहसिक प्रयोगों में एक प्रयोग यह भी था कि दिल्ली में किसी सर्वे के हवाले से उन्होंने यह घोषणा भी कर दी थी कि वे दिल्ली के सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

अगर अरविन्द का यह सर्वे बिल्कुल सही और सटीक है, योगेन्दर यादव की मौजूदगी के कारण, तो उस सर्वे का क्या जो भाजपा ने करवाया है। विजय गोयल के सर्वे में तो वे दिल्ली के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बनकर उभर रहे हैं और उनके काबिल नेतृत्व के कारण दिल्ली में भाजपा को 37 फीसदी मत मिल रहा है। दूसरे नंबर पर कांग्रेस है जिसे 34 फीसदी मत मिल रहा है। विजय गोयल के सर्वे में अरविन्द की पार्टी को दिल्ली में महज 6 प्रतिशत मत मिल रहा है। जबकि अरविन्द के अपने सर्वे में वे अपनी पार्टी को 32 फीसदी वोट दे रहे हैं। तो इस सर्वे युद्ध में कौन सही बोल रहा है? या फिर कोई सही नहीं बोल रहा है?

यानी आप आगे क्या सोचेंगे इसका निर्धारण अरविन्द केजरीवाल अपने विज्ञापनों से पहले ही सुनिश्चित कर देते हैं। वे कितनी सीट पायेंगे यह तो उनके सर्वे बता ही देते हैं, वे मुख्यमंत्री के बतौर शपथ कहां लेंगे इसकी भी जानकारी वे तब दे देते हैं जबकि बाकी दलों ने अपने अपने प्रत्याशियों तक की घोषणा न की हो। अरविन्द की इसी आक्रामकता के कारण उन्होंने पिछले तीन सालों में वह मुकाम हासिल कर लिया है जो उनके विरोधियों को सिर्फ उनकी आलोचना करने का मौका देता है, वे उनको कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। ऐसी आक्रामकता हमेशा तब आती है जब आप बहुत गहरे आत्मविश्वास से भरे हों। लेकिन यही गहरा आत्मविश्वास कभी कभी आपको बहुत सूक्ष्म में अहंकार से भरना शुरू कर देती है जो धीरे धीरे आत्मविश्वास को घोर अहंकार में तब्दील कर देती है। हमारे दौर के नरेन्द्र मोदी हों कि अरविन्द केजरीवाल दोनों ही इसी सूक्ष्म अहंकार से पीड़ित प्राणी नजर आते हैं।

अगर ऐसा नहीं होता तो अरविन्द केजरीवाल एकबार को ही सही अपनी ही पार्टी द्वारा करवाये गये सर्वे में अपनी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा दिलवाने से खुद को बचाते। हो सकता है उनका सर्वे सही भी हो लेकिन क्योंकि अपनी जीत का दावा किसी ऐसे माध्यम के जरिए वे खुद कर रहे हैं जो माध्यम कभी भी दलों के दायरे में नहीं हुआ करता तो उनका दावा आत्मविश्वास से ज्यादा अहंकारी दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम इस हकीकत को नहीं जानती होगी लेकिन वे सब कुछ जानते हुए भी अगला एजेण्डा सेट कर रहे हैं। अगर आप सर्वे देखेंगे तो पायेंगे कि अरविन्द ने बड़ी चालाकी से अपने आपको दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी घोषित कर दिया है। कुछ कुछ उसी तरह जिस तरह से अपने सर्वे के सहारे विजय गोयल ने अपने आपको दिल्ली का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है। खबर में उनकी ओर से यह प्रचारित किया गया कि उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है, लेकिन उनके सर्वे में ही साफ साफ कहा गया है कि वे सीधे तौर पर 21 सीटें सीधे तौर पर जीत रहे हैं जबकि 12 सीटों पर उन्हें मार्जिनल विक्ट्री मिल रही है। 21 सीटों पर उन्हें न्यूनतम रूप से हार का सामना करना पड़ रहा है। यानी अगर टोपीवालों ने मेहनत किया तो पार्टी की टीआरपी इतनी हाई हो जाएगी कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अलावा और बाकी दलों की जमानत जब्त हो जाएगी।

क्या सचमुच ऐसा हो जाएगा? लगता इसलिए नहीं है कि जिस दिन आप पार्टी का अपना सर्वे सामने आया है उसी दिन बाप पार्टी (भाजपा) का भी एक सर्वे सामने आया है। इस सर्वे में नतीजा निकाला गया है कि दिल्ली में विजय गोयल सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बन गये हैं। दिल्ली की 20 प्रतिशत जनता चाहती है कि विजय गोयल मुख्यमंत्री बनें जबकि 12 प्रतिशत जनता अरविन्द केजरीवाल के पक्ष में है। विजय गोयल द्वारा प्रायोजित भाजपा का सर्वे यह भी कह रहा है कि उसे दिल्ली में 39 सीटें मिल रही हैं जबकि आम आदमी पार्टी को महज 2 सीटें मिल रही हैं। वह दिल्ली में भाजपा के नहीं बल्कि बसपा के बराबर बैठ रही है। और मजेदार बात यह है कि अरविन्द के 34 हजार सैंपल सर्वे के मुकाबले विजय गोयल ने 71 हजार लोगों के सैंपल सर्वे के जरिए ये नतीजे निकाले हैं। तो क्या भाजपा के इस सर्वे को दिल्ली में आनेवाले जनादेश का रुख मान लिया जाए? अगर विजय गोयल अरविन्द केजरीवाल से मीलों आगे जाकर दिल्ली की जनता की पसंद हो सकते हैं तो निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी भाजपा से भी बड़े दल के रूप में उभर सकती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो वैसा भी नहीं है जैसा कि अरविन्द केजरीवाल एण्ड कंपनी दावा कर रही है। आप का सर्वे है, आप जो चाहें वह नतीजा निकाल सकते हैं। कोई क्या कर सकता है?

Friday, October 11, 2013

लीलाधरों की लीला का लंकादहन

लालकिला मैदान में बगल से जानेवाले रास्ते को रोक दिया गया है। पुलिसवाले किसी भी गाड़ी को अंदर नहीं जाने दे रहे हैं। वीवीआईपी पास होने के बाद भी। पुलिसवालों का कहना है कि आज बहुत भीड़ हो गई है। कल तक जो पार्किंग सौ गाड़ियों के लिए तरसती थी, आज वहां हजार से ज्यादा गाड़िया ठसाठस भरी हुई है। पुलिसवाले भी हैरान थे कि न जाने कहां से और क्यों आज इतने लोग आ गये। काफी देर बाहर ही रोकने के बाद आखिरकार उसने इस शर्त पर अंदर जाने की बात कही कि एक बार हेमा मालिनी को चले जाने दीजिए, रश कम हो जाएगा। उसके बाद जाने देंगे। लेकिन वह नौबत नहीं आई। हेमा मालिनी के बाहर गये बिना ही उसने जिन कुछ गाड़ियों को अंदर जाने दिया उसमें हम रामभक्त भी शामिल थे।

कुछ लाल पीली बत्ती गाड़ियां आ जा रही थीं लेकिन लालकिले पर सजनेवाली दिल्ली की प्रसिद्ध लवकुश रामलीला कमेटी का लंका दहन हो चुका था, फिर भी लीला जारी थी। मंच पर हेमा मालिनी अभी भी मौजूद थीं। उनके आस पास लीलाधर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। अग्रवाल जी, शर्मा जी, गुप्ता जी, जैन साहब सभी लीलाधर मौका मिलने पर बारी बारी से हेमा मालिनी को लीला का महत्व समझा रहे थे और लंका दहन के बाद का आइटम सांग भी देख रहे थे। नव सभ्यता में जो नाच रहे थे उन्हें डीजे कहा जा सकता है। एक ही सुर में कई सुरूर। जिसमें चेन्नई एक्सप्रेस का लुंगी डांस भी शामिल था और गणपति उत्सव का बप्पा मोरया भी। पलक झपकते धुन बदल रही थी लेकिन नाचनेवाले लड़के और लड़कियां न जाने लंका दहन की खुशी में या फिर हेमा मालिनी की मौजूदगी की वजह से, उत्साह में दोहरे हुए जा रहे थे। ज्यादातर मोबाइल कैमरे इस अभूतपूर्व क्षण को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे और जनता खचाखच खड़ी होकर लंकादहन के इस देहदर्शना उत्सव का भरपूर आनंद ले रही थी।

हम ज्यादा देर तक इस लुंगी डांस में शरीक नहीं रह सकते थे और न ही अग्रवाल जी, गुप्ता जी या जैन साहब की तरह हेमा मालिनी को निहार सकते थे क्योंकि अभी भी बगल की समानधर्मी नवधार्मिक लीला कमेटी का लंका दहन होना बाकी था। दिल्ली में अकेले लालकिला परिसर में तीन रामलीला होती है। परेडग्राउण्ड की धार्मिक लीला कमेटी। लाल किले की नवधार्मिक और लवकुश रामलीला कमेटी। एक ही परिसर में तीन तीन रामलीला राम जी की भक्ति है या फिर आपस की तनातनी इसे समझने के लिए आपसी झगड़ों की गहरी खाईं को लांघना पड़ेगा लेकिन तीनों ही लीला बहुत धार्मिक भाव से एक सप्ताह तक राम की लीला का मंचन करती हैं। इन तीनों लीला कमेटियों में नवधार्मिक लीला कमेटी की रामलीला सबसे कमजोर इसलिए जाती है क्योंकि वे लोग अभी तक न तो डीजे डांस तक पहुंच पाये हैं और न ही दशहरे के दिन प्रधानमंत्री उनके रावण को जलाने के लिए आते हैं। शायद लवकुश लीला कमेटी के हेमामालिनी का दबाव था या फिर कारण कुछ और। उन्होंने लवकुश लीला के लंकादहन का इंतजार किया। अब उनकी लंका में आग लगनेवाली थी, इसलिए हम टेंट का एक दरवाजा पार करके उस तरफ हो गये।

टेंट के उस पार रावण का दरबार सजा था। हनुमान लंका में प्रवेश कर चुके थे और रावण उन्हें पकड़ने के लिए अशोक वाटिका में अपने रणबाकुरों को भेज रहा था। अक्षय कुमार के निधन की सूचना के बाद मेघनाथ को भेजा गया। मेघनाथ हनुमान को पकड़कर दरबार में ले आते हैं। अब रावण और हनुमान में कुछ संवाद हो रहा है। संवाद अदायगी अच्छी है और सबकुछ डब किया हुआ है इसलिए संवाद में कहीं कोई त्रुणि या दोष नहीं है। लेकिन सामने बैठी और खड़ी जनता रामलीला मंच की बजाय उस सोने की लंका की तरफ टकटकी लगाये देख रही है जहां अब थोड़ी ही देर में लंका दहन होनेवाला है। क्योंकि घासफूस और चमकदार पन्नियों के समायोजन से सोने की वह लंका बिल्कुल मंच के सामने बनाई गई है इसलिए लोग मंच की तरफ देखने की बजाय लंका की तरफ ही देख रहे हैं। छुटपुट आतिशबाजी उनको निराश भी नहीं कर रही है। इसलिए रावण हनुमान संवाद को लेकर दर्शकगण बिल्कुल भी चिंतित नहीं है, उनकी चिंता सिर्फ लंका दहन को लेकर है। इस चिंता को दूर करने के लिए धर्मपारायण लाला जी बच्चों को पुरानी दिल्ली की मशहूर चाट खिलाकर शांत रखे हुए हैं। वैसे भी लीलाओं के लिए बंटे पास में विशेष रूप से इस बात का जिक्र किया गया है कि अगर आप लीला देखने आते हैं तो पुरानी दिल्ली की मशहूर चाट का स्वाद चखने का मौका मिलेगा।

आखिरकार वह समय आ ही गया जब रावण ने हनुमान की पूछ में आग लगाने का हुक्म दे दिया। अपने एक हाथ में पूछ रूपी मशाल थामे हनुमान मंच से नीचे उतर आते हैं और कुछ सहयोगियों के साथ पुआल, चमकीली पन्नियों से बनाई उस सोने की लंका की तरफ आगे बढ़ते हैं जिसमें आग लगाने के बाद उसमें रखे पटाखे फोड़ने का पावन कर्म करेंगे और दर्शकगण का इंतजार खत्म करेंगे। अब वीवीआईपी दर्शकदीर्घा में खड़ी, बैठी कुछ महिलाओं को याद आता है कि रामायण में हनुमान भी होता है जो लंका में आग लगाता है, तो सहसा उनके मुंह से निकलता है, इस बार हनुमान तो बहुत मोटा है। हनुमान ऐसी टिप्पणियों से बिना प्रभावित हुए लंका में आग लगाने आगे बढ़ जाते हैं और फाइनली उस लंका तक पहुंच ही जाते हैं जिसका दहन देखने के लिए आज इतनी भीड़ भरभराकर दौड़ी चली आई है।

घासफूस से बनी उस स्वर्णलंका में मशाल घुसाते ही पटाखों की तेज आवाज से पूरा वातावरण पटाखामय हो जाता है। हर हाथ अगल बगल से भागकर कानों को अपनी सुरक्षा के घेरे में ले लेते हैं। इधर जब तक लंकादहन जारी है, उधर हनुमान अपने साथियों संग फिर से मंच की तरफ अग्रसर हो जाते हैं। लोग लंकादन में डूब जाते हैं और हनुमान मंच पर पहुंचकर बाकी लीला को पूरा करने में व्यस्त हो जाते हैं। लंका दहन के बाद उन्हें राम नाम का कीर्तन करना है। वे कर भी रहे हैं, जो रामधुन बज रही है, वह सचमुच बहुत चित्ताकर्षक है। लेकिन किसी को हनुमान के राम नाम में कोई खास इंटरेस्ट नहीं है। वैसे भी 'मोटा हनुमान' डांस में उस डीजे डांस की बराबरी भी तो नहीं कर सकता जो लवकुश वाले करवाते हैं।

लीलाधरों की लीला का इससे अच्छा लंकादहन और क्या हो सकता है?

Thursday, October 10, 2013

कांग्रेस की कमजोर कड़ी

कौन क्या बोल रहा है इसका महत्व इस बात से तय होता है कि वह कहां से बोल रहा है। अगर बोलनेवाला बहुत ऊंचे से बोल रहा है तो बोलने की बाकी विशेषताओं का विश्लेषण धरा रह जाता है और सिर्फ यह देखा जाता है कि वह क्या बोल रहा है। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि वहां जहां खड़ा होता है वहां उसको सुननेवालों को आकर्षित करने के लिए उसका पद और प्रतिष्ठा पर्याप्त होती है इसलिए उसे बाकी किसी कला के इस्तेमाल की जरूरत नहीं रह जाती है। लेकिन बोलने वाला ऐसे किसी ओहदे पर न हो तो बोलनेवाले को बहुत तराजुओं पर तौला जाता है। उसका कथ्य। उसका कथानक। उसकी शैली। उसके शब्द। उसके शरीर की भाव भंगिमा और सबसे आखिर में यह कि वह जो बोल रहा है, वह कितना समयानुकूल है। राहुल गांधी के रामपुर और अलीगढ़ में दिये गये भाषणों की बहुचर्चा के बीच अगर आप उन भाषणों के अंशमात्र भी स्रोता बन पायें होंगे तो आपके लिए भी मुश्किल यही होगी कि राहुल के भाषण का आंकलन किस पैमाने पर करें?

राहुल गांधी की ओहदेदारी ऊंची है, इसमें कोई शक नहीं हो सकता। वर्तमान समय में देश की सत्ताधीश कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष से पहलेवाले उपाध्यक्ष हैं। सोनिया गांधी अपनी घोषणा पर अडिग रहीं तो 2016 के बाद राहुल गांधी ही कांग्रेस के दस जनपथ हो जाएंगे। इसलिए आज वे जो बोल रहे हैं, एक ओहदे से बोल रहे हैं। और ओहदा भी कोई ऐसा वैसा नहीं। कांग्रेस का भावी कर्णधार। इसलिए उनके बोलने में हमें हमेशा यह ध्यान रखना होता है कि वे क्या बोल रहे हैं। कैसे बोल रहे हैं इसका आंकलन दूसरे नंबर पर आता है।

इस लिहाज से अगर बुधवार को राहुल गांधी की रामपुर और अलीगढ़ में दो संक्षिप्त रैलियों में दिये गये उनके भाषणों को परखें तो बातें उन्होंने बड़ी कहीं, लेकिन कहने का अंदाज ऐसा था कि वे बड़ी बातें भी छोटी ही लगीं। मसलन, दंगे हुए नहीं करवाये गये। अगर कांग्रेस का कर्णधार यह बात बोलता है तो राजनीतिक रूप से यह बड़ी बात है, लेकिन जब राहुल गांधी के मुंह से यह बात सुनाई पड़ती है तो बचकानी सी लगती है। वह शायद इसलिए कि बड़े ओहदेदार के बोलते समय हमारी मानसिकता बोलने में उस बड़पप्पन की खोज करती रहती है जो किसी व्यक्ति को नेता और नेतृत्व बना देता है।

राहुल गांधी के एक दशक की एक दशक की राजनीतिक ट्रेनिंग के बाद भी वे कमोबेश वहीं खड़े नजर आते हैं जहां से उन्होंने ट्रेनिंग लेने की शुरूआत की थी। ऐसे में एक दशक की यात्रा के बाद राहुल गांधी नेतृत्व हो गये हैं इस बात की संभावना कांग्रेस को भले ही दिखाई दे रही हो लेकिन फिलहाल अभी तो वे नेता होने की ही प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाये हैं।

राहुल गांधी के शुरूआती दिनों के भाषणों की अगर आपको याद हो तो आप आसानी से याद कर सकते हैं कि राहुल गांधी बहुत सीखनेवाली शैली में भाषण दिया करते थे। उनको सुनते हुए लगता था मानों वे कुछ सीखकर आये हैं और उनकी कोशिश होती थी कि जो सीखकर आयें हैं वह पूरा बोल पायें। इसलिए उनके भाषणों में नौसिखिएपन की वह हड़बड़ाहट साफ झलकती थी जो किसी भी नौसिखिए में होती ही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने यूपीवालों को मुंबई में भीख मांगने की नौबत न आने देने की जो दलील दी थी, उस दलील में जान थी लेकिन न तो उनके कहने का अंदाज ऐसा था कि उससे एक आम यूपीवाला अपने आपको जोड़ पाता और न ही यह नजर आया कि यह कहते हुए खुद राहुल गांधी उस दर्द को बहुत गहरे में समझ सकते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की बन चुकी थी जिसके बारे में कांग्रेस बार बार कह रही थी अब वही देश का भविष्य होने जा रहे हैं। लेकिन आम आदमी के मन मष्तिष्क में खुद राहुल गांधी के भाषण कांग्रेसियों की इस दलील की चुगली कर देते थे।

कांग्रेस राहुल गांधी का प्रचार करे यह कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों के लिए फायदे का सौदा है। लेकिन अगर कांग्रेस के प्रचार का जिम्मा राहुल गांधी को सौंप दिया गया तो कांग्रेस भी घाटे में रहेगी और राहुल गांधी भी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की राजनीतिक शिकस्त ने उन्हें राजनीतिक रूप से जितना महत्वहीन साबित कर दिया था, राहुल गांधी के एक वाक्य ने उनमें गजब की संभावना दिखा दी थी। यह एक वाक्य किसी रैली में नहीं बोला गया था बल्कि दिल्ली के दस जनपथ में पत्रकारों के सामने बोला गया था। बहन प्रियंका के साथ मीडिया से मिलने आये राहुल गांधी ने अपनी हार को स्वीकार कर लिया था। कांग्रेस की राजतिलक वाली राजनीति में राहुल गांधी द्वारा हार को स्वीकार करनेवाले इस एक वाक्य ने उन्हें एकदम से एक नयी संभावना से भरा नेता साबित कर दिया। अगर राहुल गांधी जनता के सामने आकर अपनी हार को स्वीकार नहीं करते तो वे कांग्रेस की उसी राजतिलक वाली राजनीति का हिस्सा हो जाते जिसका बोला गया हर वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है और कांग्रेसी नेता उसे ही देश का भविष्य साबित करके अपनी राजनीतिक दुकानदारी करते हैं। राहुल गांधी ने शायद यहां कांग्रेसी रणनीतिकारों की वह सलाह नहीं मानी होगी जब राजकुमार से हार स्वीकार न करने का दबाव बनाया गया होगा। निश्चित रूप से वह राहुल गांधी का स्वविवेक रहा होगा, इसीलिए हार का वह स्वीकार कांग्रेस की जीत से भी बड़ा बना रहा था।

लेकिन शायद कांग्रेस की राजनीति में दस जनपथ के पास स्वविवेक से निर्णय लेने का बहुत कुछ अधिकार होता नहीं है। कांग्रेस का दस जनपथ अमेरिका के उस ह्वाइट हाउस की तरह है जहां राष्ट्रपति के नाम पर हर निर्णय लिये जाते हैं और शायद ही कोई निर्णय ऐसा हो जिसमें राष्ट्रपति पद पर बैठे व्यक्ति की अपनी मर्जी चलती हो। उसे वही कहना होता है जो अमेरिकी प्रशासन तंत्र उसे कहने के लिए कहता है। उसे वही करना होता है जो अमेरिकी प्रशासन तंत्र उसे करने के लिए कहता है। कांग्रेस में दस जनपथ की संप्रभु सत्ता भी कुछ ऐसी ही है। जो सर्वोपरि है वह न जाने कितने स्तंभों के सहारे ऊपर टिका हुआ है। उसे यह भी पता नहीं कि कौन सा स्तंभ कब कहां और कैसे उसको धराशायी कर देगा। आधार को कलश चाहिए तो कलश बिना आधार के वहां तक पहुंच ही नहीं पायेगा। इस तरह दोनों एक दूसरे के पूरक होकर रह जाते हैं।

राहुल गांधी भी इस पूरकता के अपवाद नहीं रह सकते। कांग्रेस का भविष्य अगर राहुल गांधी हैं तो राहुल गांधी का भविष्य भी कोई भारतीय जनता पार्टी नहीं है। आखिरकार उन्हें वही करना और कहना होगा जो कांग्रेस की राजनीतिक परंपरा और विरासत बन गई है। बताने की जरूरत नहीं कि इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को गांधी केन्द्रित करने के लिए जो नींव रखी उसकी परंपरा और विरासत क्या है। राहुल गांधी उसी विरासत के एक छोर पर खड़े हैं। इसलिए जैसे ही राहल गांधी एक स्वतंत्र नौजवान होते हैं, वे उसी तरह से व्यवहार करने लगते हैं जैसे उनके जैसा कोई नौजवान कर सकता है। लेकिन जैसे ही उनके कंधों पर कांग्रेस की राजनीतिक विरासत धर दी जाती है, राहुल गांधी धराशायी हो जाते हैं। अलीगढ़ और रामपुर की रैलियों में जब तक राहुल गांधी एक स्वतंत्र नौजवान की तरह बोलते रहे, तो जाहिर सी बात है वे सामान्य नौजवान की तरह ही बात करते रहे लेकिन जैसे ही उनके कंधों पर कांग्रेस की विरासत का बोझ आया और उन्होंने कांग्रेस सरकार की योजनाओं का महत्व समझाना शुरू किया वे फिसलकर फिसड्डी हो गये।

अलीगढ़ में अपने भाषण के दौरान उन्होंने जो राजनीतिक और विकास की बातें कहीं वह तो खबर इसलिए बनी क्योंकि बोलनेवाला ऊंचा ओहदेदार था, लेकिन जो खबर नहीं बनी उसे खबर बना दिया जाए तो? क्योंकि बोलनेवाला कैसे बोल रहा है, कम से कम राहुल गांधी को अभी यही कसौटी पूरी करना पूरी तरह से बाकी है। इसलिए अगर वे अपने भाषण के दौरान सबको खाना खिलाने की योजना का बखान करते हुए यह कहते हैं कि "नहीं, सुनो मैं आपको बताना चाह रहा हूं।" तो अचानक मुशर्ऱफ याद आने लगते हैं जो सैन्य तानाशाह से नेता बने तो बिल्कुल इसी शैली में बात करते थे कि जब बिजली की मोटर चलेगी, तो पानी निकलेगा। और जब पानी निकलेगा तो वह खेतों में जाएगा और फिर वे लोगों से पूछते थे कि खेतों में पानी जाने के बाद क्या होगा, यह आपको मालूम है न? अपनी सभा के दौरान हो सकता है राहुल गांधी ने बहुत सहज होने के लिए भाषण की मुशर्ऱफ शैली का इस्तेमाल किया हो लेकिन साफ दिख रहा था कि वे यह सब सिर्फ अपने आपको सहज बनाने के लिए कर रहे हैं। उन्हें यह फर्क शायद समझ में नहीं आया कि वे पार्टी वर्करों की मीटिंग नहीं बल्कि पार्टी द्वारा ही इकट्ठा की गई जन रैली को संबोधित कर रहे हैं।

इसलिए अगर उनके कहे को नेता का भाषण मान लें तो अखबारों में वही सारी अच्छी अच्छी रिपोर्टिंग पढ़ लें तो जरूर वे हमें भी भावी कर्णधार नजर आने लगेंगे। लेकिन अब जमाना अखबार और बयान का नहीं बल्कि टेलीवीजन और टेलिकास्ट का है। और इस युग में समूहगत रूप से झांसा देना नरेन्द्र मोदी और उनकी पीआर कंपनी तक के लिए संभव नहीं हो पा रहा है तो राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए कहां से संभव हो पायेगा। इसलिए अच्छा हो कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार उन्हें अपना प्रचारक नियुक्त करने की बजाय अभी कुछ और वक्त सिर्फ सपनों का राजकुमार ही बने रहने दे। राहुल गांधी जिस अंदाज में यथार्थ का भाष्य करते हैं वह कांग्रेस के लिए इस टेलिकॉस्ट युग में घाटे का सौदा भी साबित हो सकता है। मुशर्ऱफ की योजनाएं और उपलब्धियां अगर पाकिस्तान को समझ में आ गई होतीं तो पाकिस्तान में आज नवाज शरीफ के पाकिस्तान मुस्लिम लीग की नहीं बल्कि मुशर्ऱफ के आल पाकिस्तान पीपुल्स लीग की सरकार होती।

Wednesday, October 9, 2013

हरेन हत्याकांड का जिन्न

आज वंजारा जो बात सीबीआई से कह रहे हैं वही बात कल तक हरेन पंड्या के पिता विट्ठल पंड्या सुप्रीम कोर्ट से और पत्नी जागृति पांड्या जनता से कहती रही हैं कि हरेन की हत्या के पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश है। तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की हत्याएं सिर्फ इसलिए कर दी गईं ताकि हरेन पंड्या की हत्या का राज हमेशा के लिए राज ही रह जाए? वंजारा के संकेतों से तो यही संदेह उभर रहा है।  
 
उस दिन भोपाल में गिनीज बुक में दर्ज होनेवाली भाजपा की रैली में भी वह शेर वहां दहाड़ने ही आया था। आडवाणी और मोदी के मिलन प्रसंग के परे वह शेर मंच से दहाड़ा भी लेकिन उसकी दहाड़ में चिंताभरी एक ऐसी लाइन भी सामने आई थी जिस पर मीडिया ने बहुत ध्यान हीं दिया। भाजपा के इस शेर ने उस रैली में वह बोला था जो अब तक उसने कभी और कहीं नहीं कहा था। मुलायम और  मायावती की तर्ज पर भाजपा के इस शेर ने अपना वह डर पहली बार प्रकट किया कि इस बार कांग्रेस की ओर से सीबीआई आम चुनाव लड़ेगी। नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और प्रचार के बीच उनका यह डर सचमुच चौंकानेवाला था। क्योंकि अपनी राजनीतिक हैसियत और कद के लिहाज से नरेन्द्र मोदी न तो मुलायम सिंह यादव हैं और न ही मायावती कि उन्हें यह कहना पड़े कि कांग्रेस उनके खिलाफ सीबीआई का दुरूपयोग कर सकती है। फिर, आखिरकार नरेन्द्र मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के सबसे बड़े मंच से यह बात क्यों कही?

जिस वक्त नरेन्द्र मोदी यह बात बोल रहे थे उससे थोड़े ही समय पहले डीजी वंजारा ने एक चिट्ठी लिखकर सनसनी पैदा कर दी थी। अपनी चिट्ठी में उन्होने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा था कि वे तो आदेश का पालन कर रहे थे, और वे जेल में हैं लेकिन जो लोग उनसे वह सबकुछ करवा रहे थे उनको आजादी क्यों है? नरेन्द्र मोदी के करीबी और तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह का तो उन्होंने अपनी चिट्ठी में नाम भी लिया है। लेकिन यह तो वह किस्सा था जो मीडिया के जरिए लोगों के सामने आया। जो सिर्फ सूत्रों के हवाले से या फिर गोपनीय सूचना के तौर पर बताया जा रहा है, वह यह कि वंजारा ने सीबीआई को हरेन पांड्या की हत्या को नये सिरे से जांच करने के कुछ जरूरी टिप्स भी दिये हैं। सीबीआई टीम से मुलाकात के दौरान कथित तौर पर वंजारा ने कहा है कि पंड्या की हत्या राजनीतिक साजिश थी। जिस वक्त 2003 में भाजपा के कद्दावर नेता हरेन पांड्या की हत्या हुई थी उस वक्त वंजारा उसी एटीएस के चीफ थे जो जिसके छह आईपीएस अफसर और 32 दूसरे पुलिसकर्मी इस वक्त जेल में बंद हैं। खुद शोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति, और इशरत जहां के फर्जी मुटभेड़ में अहमदाबाद की सेन्ट्रल जेल में बंद वंजारा ने अगर यह सूत्र सीबीआई को दिया है तो जाहिर है, यह नरेन्द्र मोदी के लिए चिंता की बात होगी।

सीबीआई को लेकर नरेन्द्र मोदी चिंतित हैं इसका प्रमाण सिर्फ भोपाल की रैली में ही नहीं मिला। इसके बाद अचानक दिल्ली में नरेन्द्र मोदी की टीम सक्रिय हुई। बताते हैं कि दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह नरेन्द्र मोदी और अरुण जेटली के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसके बाद भाजपा नेता अरुण जेटली की ओर से एक नहीं दो दो पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गये जिसमें नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सीबीआई के दुरूपयोग की आशंका जताई गई। और सिर्फ पत्र ही नहीं भेजे गये। बाकायदा प्रेस कांफ्रेस करके अरुण जेटली ने कहा कि केन्द्र सरकार मोदी के खिलाफ सीबीआई की दुरूपयोग कर सकती है। अरुण जेटली ने इसके बाद दिल्ली होते हुए मुंबई की जो यात्रा की उसमें एक बार फिर उन्होंने उनके खिलाफ सीबीआई के दुरूपयोग की बात की। अब यह कुछ ऐसा था जैसे रामदेव हर जगह कांग्रेस को घेरने के लिए सीबीआई के दुरूपयोग का हवाला देते रहते हैं। रामदेव के गुरू शंकरदेव की हत्या का मामला भी सीबीआई के पास है। और जब से सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू की है रामदेव कांग्रेस के खिलाफ खुलकर खड़े हो गये हैं। तो क्या नरेन्द्र मोदी को भी किसी ऐसे हत्याकांड का डर सताने लगा है जिसमें सीबाआई उनके खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई कर सकती है जिससे उनका राजनीतिक कैरियर तबाह हो सकता है? क्या सचमुच उन अफवाहों में कोई दम है कि डीजी वंजारा ने हरेन पांड्या हत्याकांड की नये सिरे से जांच के सूत्र सीबीआई को दिये हैं, जिसके कारण भाजपा के भीतर मोदी और उनके मित्रों की चिंता बढ़ गई है?

सिर्फ अरुण जेटली और नरेन्द्र मोदी की सार्वजनिक चिंता को छोड़ दें तो फिलहाल ऐसे कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं कि सीबीआई हरेन पांड्या के हत्यारों को पकड़ने का नये सिरे से कोई अभियान शुरू करनेवाली है। लेकिन लंबे समय से हरेन पांड्या की विधवा जागृति पंड्या इस बात की मांग तो कर ही रही हैं कि उनके पति के हत्याकांड की नये सिरे से जांच होनी चाहिए। 2009 में हरेन पांड्या के पिता विट्ठल पांड्या खुद सुप्रीम कोर्ट आये थे यह अर्जी लेकर कि सुप्रीम कोर्ट उनके बेटे के हत्यारों तक पहुंचने के लिए अमित शाह और नरेन्द्र मोदी से भी पूछताछ की जाए। विट्ठल पांड्या ने उस वक्त शिकायत की थी कि सीबीआई उनकी बहू जागृति पांड्या (हरेन पांड्या की पत्नी) से भी बतौर गवाह पूछताछ नहीं कर रही है। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने हरेन पांड्या की याचिका यह कहते हुए वापस कर दी कि वे सीबीआई को ऐसा निर्देश नहीं दे सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी पर आरोप लगाने का कोई आधार होना चाहिए। सिर्फ शिकायत के आधार पर इस तरह से पूछताछ की इजाजत नहीं दी जा सकती। उस वक्त निश्चित ही सीबीआई के पास हरेन पांड्या हत्याकांड में नरेन्द्र मोदी या अमित शाह से पूछताछ का कोई आधार नहीं रहा होगा इसलिए बाप से सहानुभूति रखते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने बेटे की हत्या में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर संदेह करने से मना कर दिया।

तो क्या अब जेल में बंद वंजारा ने सीबीआई को सचमुच कोई ऐसा सूत्र दे दिया है जिसके आधार पर हरेन पांड्या हत्याकांड में सीबीआई नरेन्द्र मोदी तक अपनी पहुंच बना सकती है? भाजपा की घबराहट और एक दशक में बदली हुई परिस्थितियां तो यही संदेह पैदा कर रही हैं। जिस वक्त जुलाई 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने विट्ठल पांड्या की अर्जी को खारिज किया था उस वक्त कथित तौर पर हरेन के हत्यारे सलाखों के भीतर थे। उनमें से एक प्रमुख अभियुक्त था असगर अली। असगर अली उन 12 संदिग्ध में से एक था जिन्हें सीबीआई द्वारा हरेन पंड्या की हत्या में गिरफ्तार किया गया था। करीब एक दशक की कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार जुलाई 2011 में गुजरात हाईकोर्ट ने सभी अभियुक्तों को हत्या के साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। हालांकि बरी होने के बाद भी असगर अली अभी भी आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जेल में बंद है क्योंकि साजिश का मामला अभी भी उसके ऊपर दर्ज है।

इस बीच हरेन के पिता विट्ठल का देहांत हो चुका है और अब हरेन पांड्या की पत्नी जागृति पांड्या अकेले न्याय के लिए जंग लड़ रही हैं। जागृति पांड्या ने अभी इसी साल जून 2013 में असगर अली से विशाखापत्तन जेल में जाकर मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद जागृति पांड्या ने तीन बातें साफ तौर पर कहीं थीं। एक, हैदराबाद का रहनेवाला असगर पहली बार अप्रैल 2013 में गुजरात तब गया था जब उसे गुजरात पुलिस द्वारा हरेन की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके गुजरात ले जाया गया जिसके बाद उसे सीबीआई को सुपुर्द कर दिया गया। दो, आईबी का वह संदिग्ध अधिकारी राजेन्द्र कुमार ही इसे पूरे घटनाक्रम के पीछे कहीं न कहीं मौजूद रहा है जिसे लेकर अभी सीबीआई और आईबी के बीच नूरा कुश्ती हो चुकी है। और तीन, एनडीए सरकार के दौरान असली दोषियों को बचाने के लिए सीबीआई का जमकर दुरूपयोग किया गया। जागृति पांड्या की इन तीन बातों को आपस में जोड़े तो जो तस्वीर उभरती है वह यह कि हरेन पांड्या की हत्या उसी फर्जी एनकाउण्टर समूह द्वारा किया गया जो गुजरात को आतंकवाद से मुक्त कराने के नाम पर कुछ खास लोगों को निपटाने का काम कर रहा था। इनमें शोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति दो ऐसे नाम हैं जो कम से कम पाकिस्तान से आये आतंकवादी नहीं थे।

उलटे भट्ट के शपथपत्र के बाद तुलसीराम प्रजापति का नाम हरेन पांड्या की हत्या में सामने आ चुका है। गुजरात भाजपा में केशुभाई पटेल के करीबी और इंसानियत की राजनीति के प्रतीक समझेजाने भाजपा के कद्दावर नेता हरेन पांड्या की हत्या 26 मार्च 2003 को हुई। अहमदाबाद के लॉ पार्क में खड़ी कार में उनकी लाश मिली। हत्या संदेहास्पद थी और उस वक्त भी हरेन पांड्या की हत्या पर यह कहते हुए शक जाहिर किया गया था कि जिस तरह से गोली उनके शरीर में निचले हिस्से से ऊपरी हिस्से की ओर गई है उससे यह साबित होता है कि कार में उन्हें गोली नहीं मारी गई है। बल्कि उनकी हत्या कहीं और की गई और बाद में उन्हें कार में डाल दिया गया है। हरेन की हत्या के तीन साल बाद तुलसीराम प्रजापति की भी गुजरात एनकाउण्टर टीम ने 2006 में हत्या कर दी। तुलसीराम प्रजापति का एनकाउण्टर करने के साल भर पहले 2005 में शोहराबुद्दीन को भी उसी  एनकाउण्टर टीम ने निपटा दिया था जिसके ज्यादातर अधिकारी इस वक्त जेल में हैं।

हरेन पंड्या की हत्या में तुलसीराम प्रजापति का पहली बार नाम संजीव भट्ट ने। पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव ने 2011 में कहा था कि 2003 में असगर अली ने उनसे व्यक्तिगत रूप से कहा था कि हरेन पंड्या पर गोली चलानेवाला कोई और नहीं तुलसीराम प्रजापति ही था। गुजरात हाईकोर्ट में एपिडेविट देकर भट्ट ने कहा था कि उस वक्त वे साबरमती जेल सुपरिटेन्डेन्ट थे और उनके पास इस बात के बहुत पुख्ता सबूत हैं कि हरेन पंड्या की हत्या के पीछे कोई बहुत बड़ी गहरी राजनीतिक साजिश थी। संजीव भट्ट के तर्कों और आरोपों को कोई बहुत महत्व नहीं मिला क्योंकि संजीव भट्ट मोदी विरोधी अधिकारी घोषित हो चुके थे। लेकिन अब कमोबेश वही बात अगर कथित तौर पर वंजारा सीबीआई अधिकारियों से कह रहे हैं तब? वंजारा न सिर्फ मोदी के विश्वासपात्र आईपीएस अधिकारी थे बल्कि उस दौर में गुजरात एटीएस के चीफ थे जिस दौर में ये हत्याकांड हो रहे थे।

गुजरात में मोदी के राजनीतिक उभार के वक्त गुजरात में सिर्फ हरेन पंड्या ही वह आखिरी नौजवान नेता बचे थे जो गुजरात भाजपा का भविष्य बनकर उभर रहे थे। केशुभाई पटेल, संजय जोशी और गोरधन झड़पिया के करीबी कहे जानेवाले पंड्या को मोदी पहले ही राजनीतिक रूप से असक्त बना चुके थे। 2001 में जिस वक्त नरेन्द्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया उस वक्त हरेन पंड्या गुजरात के गृहमंत्री थे। वे एलिसब्रिज सीट से चुनकर गुजरात विधानसभा पहुंचे थे। बताते हैं कि गुजरात दंगों के दौरान उन्होंने गुजरात सरकार के रूख का कैबिनेट की बैठकों में कड़ा विरोध किया था जिसका खामियाजा उन्हें मोदी विरोधी के रूप में भोगना पड़ा। उस वक्त मोदी सरकार में गृहमंत्री होते हुए भी उन्होंने दंगों के विरोध में हो रही जनसुनवाईयों में हिस्सा लिया था। जाहिर है, गुजरात में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में जिस नई राजनीति की शुरूआत हो रही थी, वे उसका विरोध कर रहे थे। इसका खामियाजा उन्हें अगले ही चुनाव में उठाना पड़ा। पहले मोदी ने एलिसब्रिज से उनका टिकट काट दिया और केन्द्र के हस्तक्षेप के बाद पंड्या को टिकट मिला भी तो जीतने के बाद मोदी मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं मिली।

लेकिन हरेन पंड्या को सिर्फ राजनीतिक रूप से कमजोर करके ही नरेन्द्र मोदी संतुष्ट नहीं थे। विरोधी को समाप्त करने की अपनी विशिष्ट शैली के लिए पहचाने जानेवाले नरेन्द्र मोदी हरेन पंड्या पर अपने खुफिया तंत्र के जरिए पूरी नजर रख रहे थे। मीडिया रपटों के अनुसार उस वक्त गुजरात सरकार न सिर्फ हरेन पंड्या के हर मूवमेन्ट पर नजर रख रही थी बल्कि हरेन पंड्या का फोन भी टेप हो रहा था। ऐसा संभवत: इसलिए कि हरेन पंड्य ही गुजरात की राजनीति में वह शख्सियत बचे थे जिनके नेतृत्व में गुजरात भाजपा के मोदी विरोधी नेता मोदी के खिलाफ विद्रोह कर सकते थे। और यह सब बहुत दिन नहीं चला जब अचानक मार्च 2003 में बहुत संदेहास्पद परिस्थितियों में हरेन पंड्या की हत्या कर दी गई। इसके बाद सिलसिलेवार चले हत्याकांड के क्रम में मोदी का कद लगातार ऊंचा ही उठता गया और पार्टी के भीतर भी हरेन की हत्या अतीत का एक हादसा बनकर रह गई।

अब एक दशक बाद वंजारा के विद्रोह ने हरेन पंड्या की हत्या को नये सिरे से जिंदा कर दिया है। हरेन के तथाकथित हत्यारों को हाईकोर्ट ने मुक्त कर दिया है और सीबीआई अब सुप्रीम कोर्ट में है। इसलिए हरेन की हत्या में नये सिरे से खोजबीन शुरू हो सकती है। सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति हत्याकांडों के जरिए इस खोजबीन की आंच पहली बार अमित शाह और नरेन्द्र मोदी तक पहुंच सकती है। निश्चित रूप से मोदी के बढ़ते राजनीतिक कद के लिए यह हरेन हत्याकांड का जिन्न कभी भी प्रेतछाया की तरह उनके पीछे पड़ सकता है। कम से कम भाजपा का डर और मोदी का सीबीआई पर संदेह तो इसी शक को पुख्ता कर रहे हैं।

Thursday, September 26, 2013

दगाबाजों के दीनदयाल

भारतीय जनता पार्टी की भोपाल रैली के लिए सिर्फ अलग अलग संभागों और विभागों से कार्यकर्ता ही नहीं बुलाए गये थे। गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी वहां मौजूद रहने के लिए कहा गया था। कारण यह कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा यह इतिहास का सबसे बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन था जिसमें मंच से इस बात की पुष्टि की गई कि कुल 7 लाख 21 हजार कार्यकर्ता इस सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। अब पता नहीं गिनीज बुक वालों ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा सम्मेलन बताकर रिकार्ड में दर्ज किया या नहीं लेकिन एक कारण ऐसा जरूर था जिसके चलते भाजपा के भीतर यह रैली इतिहास के रूप में दर्ज हो गई। वह कारण है- दीनदयाल से दगाबाजी।

भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना भले ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की हो लेकिन इसका सांगठनिक ढांचा जिस व्यक्ति ने खड़ा किया उसका नाम पं दीनदयाल उपाध्याय था। दीनदयाल उपाध्याय संघ के प्रचारक थे और संघ ने उन्हें राजनीतिक कार्य करने के लिए भारतीय जनसंघ में भेजा था। 1951 में भारतीय जनसंघ की उन्हें पहली जिम्मेदारी मिली थी- उत्तर प्रदेश का मंत्री। जल्द ही वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री बना दिये गये और उस वक्त कानपुर अधिवेशन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दीनदयाल उपाध्याय के बारे में कहा था कि अगर उन्हें दो दीनदयाल मिल जाते तो वे भारतीय राजनीति की दशा बदल देते।

डॉ. मुखर्जी ने दीनदयाल उपाध्याय के बारे में कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। पंडित जी में कई विलक्षण प्रतिभाएं थीं। एकसाथ वे जितने कुशल संगठनकर्ता थे, उतने ही कुशल विचारक। पवित्रता उनके जीवन का सार थी और प्रचार से वे हमेशा दूर रहते थे। उनकी इन्हीं खूबियों की वजह से वे केवल जनसंघ के आदरणीय नेता नहीं थे बल्कि 1963 में जब अमेरिका ने पंडित जी को वीजा देने में अड़ंगा लगाया तो खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्तक्षेप करके उन्हें वीजा दिलवाया। हालांकि अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्र राज्य और अमेरिकी नागरिकों को अलग अलग देखा और अपनी पोलिटिकल डायरी में लिखा कि वहां की जनता वैसी नहीं है जैसी वहां की सरकार दिखती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी जनता के व्यवहार में व्यापक परिवरर्तन आया है।

लेकिन दीनदयाल उपाध्याय का जिक्र यहां अमेरिका प्रकरण के कारण नहीं बल्कि उनके राजनीतिक और आर्थिक चिंतन और वर्तमान संदर्भों में उसकी समीक्षा के कारण है। दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनता पार्टी एकात्ममानववाद का प्रणेता मानती है जो मूल रूप से आर्थिक चिंतन है लेकिन इस चिंतन का विस्तार समाज और संस्कृति तक विस्तारित होता है। एकात्म मानववाद पर बहुत विमर्श है लेकिन पंडित जी का एक और डायग्राम है अखण्ड मंडलाकार व्यवस्था। यह अखंड मंडलाकार व्यवस्था पंडित दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक चिंतन है। एक रेखाचित्र के जरिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस राजनीतिक चिंतन की जो रुपरेखा खींची है उसमें व्यक्ति, परिवार, ग्राम, नगर, राज्य और राष्ट्र का क्रम निर्धारित किया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इस अखंड मंडलाकार व्यवस्था में राष्ट्र पर इति नहीं की गई है। इसके आगे एक पायदान और हैं। और वह पायदान है- मानवता। पंडित जी के राजनीतिक चिंतन में यह बात समाहित थी कि हर प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक या फिर आर्थिक चिंतन के मूल में इंसान और इंसानियत में अगर किसी एक को चुनना हो तो इंसानियत को चुनना चाहिए। मानवता मानव से भी श्रेष्ठ लक्ष्य है। अगर कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है जिसके मूल में इंसानियत को आला दर्जा दिया जाता है तो वही व्यवस्था अखंड मंडलाकार व्यवस्था हो सकती है।

भोपाल की रैली में उमा भारती ने किनारे कर दिये गये महारथी लालकृष्ण आडवाणी को यह कहकर प्रासंगिक रखने की कोशिश की कि वे भाजपा के जीवित दीनदयाल हैं। राजनीतिक कसौटी पर परखें तो बहुत आंशिक तौर पर ही उमा भारती की यह बात सही नजर आती है। लेकिन उन मोदी महराज का क्या जो दीनदयाल के विचार के उलट सिर्फ प्रचार और भितरघात की पैदाइश बनकर भाजपा के क्षितिज पर उभर आये हैं? अगर वे भी दीनदयाल को अपना अतीत बताएं तो दीनदयाल के सामने संकट पैदा हो जाएगा कि वे किसे अपना भविष्य बताएं। आडवाणी को या फिर मोदी को?

पंडित जी जिस दौर में इसी राजनीतिक चिंतन के आधार पर भारतीय जनसंघ का सांगठनिक विस्तार कर रहे थे उसी दौर में जनसंघ में अटल बिहारी वाजपेयी का उभार हुआ था। लिखित तौर पर प्रमाण कहीं मिले या न मिले लेकिन दिल्ली के राजनीतिक इतिहासकार अक्सर इस बात की चर्चा करते हैं कैसे दीनदयाल जी के सामने अटल बिहारी वाजपेयी बौने साबित होते थे। कारण सम्मान भी हो सकता था लेकिन असल बात थी दीनदयाल उपाध्याय की वह नीति जो शायद अटल बिहारी जैसे उभरते नेतृत्व को अपच होती थी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रचारात्मक प्रवृत्ति के नेता थे और मानते थे कि नेता का प्रचार दल के प्रसार के लिए जरूरी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस बात के सख्त खिलाफ थे। वे राजनीति को वैमनस्य की नीति नहीं मानते थे और विरोधी दल की निंदा करने की बजाय अपनी नीतियों का प्रचार करने पर बल देते थे।
दीनदयाल उपाध्याय की असमय मौत हुई। भारतीय जनसंघ असफल होते हुए भारतीय जनता पार्टी में परिवर्तित हो गया और परिवर्तन की इस प्रक्रिया में अटल बिहारी वाजपेयी का वही राजनीतिक उदारीकरण साथ हो गया जिसके तहत उन्होंने भाजपा को एकात्म मानववादी रास्ते पर आगे ले जाने की बजाय समाजवादी संस्करण गढ़ने में व्यस्त हो गये। 1980 से 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के भीतर निर्विरोध और निर्विवाद रूप से अटल कालखण्ड रहा और उन्होंने संघ की राजनीतिक विचारधारा के साथ गैर संघीय राजनीतिक दलों के साथ ऐसा साझा तालमेल किया कि देश के हाथ गठबंधन दलों की स्थिर सरकार का फार्मूला लग गया। हालांकि इस फार्मूले का समर्थक संघ कभी नहीं रहा लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के सामने संघ भी सिवा तालमेल के और कोई घालमेल कर नहीं सका।

लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के मुक्त होते ही संघ ने राजनीतिक रूप से भाजपा को फिर से उसी दिशा में ले जाने कोशिश शुरू कर दी जहां से जनसंघ का रास्ता भटका था। हालांकि इस भटके रास्ते पर दोबारा वापसी के बीच गंगा में बहुत पानी बह चुका है लेकिन संघ जिस नयी राजनीति की बिसात बिछा रहा है उसमें अटल बिहारी वाजपेयी के संघीय समन्वय का पूरी तरह से इंकार तो है ही, बहुत सारे वैचारिक मामलों में वह दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को भी तिलांजलि देता है। संघ द्वारा नरेन्द्र मोदी का समर्थन उन्हीं में से एक है। दीनदयाल उपाध्याय जिस कट्टर राजनीतिक हिन्दुत्व के पैरोकार नहीं थे और राजनीति को नफरत का औजार नहीं बनने देना चाहते थे, नरेन्द्र मोदी उन्हीं तत्वों के माहिर खिलाड़ी हैं। अगर दीनदयाल उपाध्याय को उस दौर में भी प्रचार प्रेमी अटल बिहारी वाजपेयी नागवार गुजरते थे तो इस दौर में नरेन्द्र मोदी सिर्फ और सिर्फ प्रचार और प्रोपोगेण्डा की ही देन हैं। फिर भी संघ नरेन्द्र मोदी को सिर्फ भाजपा का नहीं बल्कि संघ का उद्धारक भी मान बैठा है क्योंकि अपने प्रचार तंत्र की बदौलत वे भीड़ को आकर्षित करते हैं।

यानी आज संघ हो कि भाजपा दोनों ही दीनदयाल के उस मूल विचार को पूरी तरह से खारिज करते हुए दिखाई दे रहे हैं जो उनके राजनीतिक चिंतन और कार्यशैली का मूलाधार है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे शालीन और अपेक्षाकृत कम प्रचार प्रेमी भी अगर दीनदयाल उपाध्याय को खटकते थे तो नरेन्द्र मोदी जैसे प्रचार की पैदाइश कहां से दीनदयाल की भाजपा के भविष्य हो सकते हैं? लेकिन वह जनसंघ तो उसी दिन तिरोहित हो गया जिस दिन अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा बनाई। लेकिन वह भाजपा भी उस दिन नहीं रही जिस दिन नरेन्द्र मोदी जैसे प्रायोजित और प्रक्षेपित नेता को साजिश के तहत पार्टी के भीतर शीर्ष नेतृत्व घोषित कर दिया गया। वह संघ तो वह संघ रहा ही नहीं जो दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ में काम करने की जिम्मेदारी सौंपता है। वह संघ होता तो आज जरूर सवाल उठाता कि आखिर दीनदयाल से इस दगाबाजी से भाजपा क्या हासिल करना चाहती है? नरेन्द्र मोदी?

Saturday, September 14, 2013

नरेन्द्र मोदी लाइव

13 सितंबर 2013। शाम के पांच बज चुके थे। अशोक रोड को एक बार फिर दोनों ओर से बंद कर दिया गया था। रायसीना की तरफ से आनेवाली गाड़ियों को इंडिया गेट की तरफ जाने से रोक दिया गया था। उन पत्रकारों की गाड़ियों को भी बैरिकेटिंग के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था जिन्हें पहुंचने में पांच बज गया था। ठीक बीच सड़क में भाजपा कार्यालय के सामने कोई डेढ़ दो दर्जन लोग पटाखे और फुलझड़िया छुड़ाते हुए मीडिया के सामने पोज बन रहे थे। यह मोदी के आकर्षण से ज्यादा कैमरों का आकर्षण नजर आ रहा था कि मुट्ठीभर लोग चिल्ला चिल्लाकर पूरे देश को यह संदेश दे रहे थे कि भाजपा ने नई सोच के साथ नई दिशा पकड़ ली है। पटाखों और फुलड़ियों की लड़ियां इतनी थीं कि आनेवाले दो तीन घण्टों तक वे अभी और इसी तरह अपना उत्साह कायम रख सकते थे।

ढोल ताशों और नगाड़े वालों की तो मानों बारात ही आ गई थी। वैसे भी कोई शादी विवाह हो कि सामाजिक धार्मिक उत्सव। ये ढोल ताशेवाले हमेशा इतने उत्साह में रहते हैं कि बारात उन्हीं के घर से निकलकर उन्हीं के किसी रिश्तेदार के घर में पहुंच रही है। इसलिए इनके इत्साह को भाजपा का उत्साह मान लेना थोड़ी सी भूल हो जाएगी। भाजपा कार्यालय के बाहर और भीतर ये ढोल ताशे वाले समान रूप से मौजूद थे और पूरे जूनून में नगाड़ा पीट रहे थे। कुछ उत्साही लोगों के हाथ में जो बैनर नजर आ रहा था उसमें भाजपा को इस बात के लिए धन्यवाद दिया गया था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

पांच बजकर दस मिनट।
भाजपा कार्यालय के भीतर भाजपा कार्यकर्ताओं से ज्यादा मीडिया, कैमरों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की भीड़ नजर आ रही है। सुरक्षा जांच से गुजरकर अंदर आनेवाली झंझट खत्म करने के लिए  भाजपा कार्यालय के दो दरवाजों में से एक को खोल दिया जाता है। लेकिन बाहर अगर पैसा लेकर नगाड़ा पीटनेवाले बैंड बाजा बाराती ही अब तक जमा हो पाये हैं तो अंदर भी टीवी चैनल के कैमरामैनों की सक्रियता ज्यादा नजर आ रही है। भाजपा कार्यालय के मुख्यभवन के मुख्य द्वारा पर कोई दो तीन दर्जन टीवी कैमरामैन और इतने ही फोटोग्राफर मुंह बाये खड़े हैं। कुछ तो इतने उत्साही हैं कि छत पर चढ़ गये हैं और वहां से मुख्य द्वार को "शूट" करने की पोजीशन लेकर खड़े हो गये हैं।

पांच बजकर बीस मिनट।
शहनवाज हुसैन और विजय सोनकर शास्त्री सहित ऐसे ही अनेक बी ग्रेड नेताओं के चेहरे दिखने लगते हैं जिन्हें प्रवक्ता पद दिया गया है। आगे पीछे ऐसे ही कुछ नेता और कुछ नेता नुमा लोग नजर आ रहे हैं जबकि मुख्य भवन के पिछवाड़े में तेजी से एक अस्थाई मंच बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। न जाने किन टीवी चैनलों ने अपने ट्राली कैमरे का झंडा भी यहां गाड़ दिया है और वे लोग भी अपनी अपनी जुगत बनाने में लगे हुए हैं। पिछवाड़े लान में इधर उधर छुटभैये नेता दो दो चार चार की झुंड में खड़े हैं और पत्रकार बिरादरी ने भी अपनी अपनी जान पहचान के हिसाब से अपने अपने झुंड विकसित कर लिये हैं। मानों सब इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने की प्रतीक्षा कर रहे हों।

पांच बजकर तीस मिनट।
मुख्य द्वार से पहली बड़ी गाड़ी अंदर आती है। पता चला सफेद होण्डा एकार्ड कार में जो नेता आई हैं वे सुषमा स्वराज हैं। इस बीच भाजपा कार्यालय के भीतर चल रहा टीवी चैनल बताता है कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी अपने घर से चल चुके हैं। अशोक रोड पर ही दो चौराहा पार करके रहनेवाले राजनाथ सिंह को पहुंचने में कितनी देर लगेगी इसका अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था। मंच बनानेवाला बड़ी फुर्ती से काम कर रहा है और जितने कैमरामैन आगे गेट पर मौजूद थे करीब उतने ही वहां भी आकर खड़े हो गये। इतने ही अंदर प्रेस कांफ्रेस रूम में सेट थे। लगता था टीवी चैनलों ने आज अपनी सारी ताकत भाजपा कार्यालय के भीतर झोंक दी थी। टीवी रिपोर्टिंग के लिहाज से एकसाथ तीन सेट तैयार हो रहे थे। एक भाजपा भवन के गेट पर। दूसरा सार्वजनिक सभा के मंच पर और तीसरा प्रेस कांफ्रेस वाले हाल में। लेकिन अभी भी कार्यकर्ताओं की भीड़ कमोबेश नदारद।

छह बजकर जीरो मिनट।
भाजपा कार्यालय के भीतर जो टीवी चल रहा था अचानक उस पर ब्रेकिंग न्यूज आती है कि आडवाणी संसदीय समिति की बैठक में नहीं आयेंगे। इसी के साथ उस टीवी चैनल पर एक खबर फ्लैश करती है कि नरेन्द्र मोदी का काफिला गुजरात भवन से चल चुका है और बस थोड़ी ही देर में उनका काफिला भाजपा कार्यालय के भीतर दाखिल होनेवाला है। मंच तैयार करनेवाले कारीगरों ने जो साउण्ड सिस्टम लगाया है उस पर देशभक्ति के गाने बजने शुरू हो गये हैं और बीच बीच में माइक चेक माइक चेक की आवाज से वह पोडियम के माइक को भी सेट कर रहा है। अब तक भाजपा कार्यालय के भीतर अप्रत्याशित रूप से लोग नजर आने लगे हैं और नगाड़ों की धुन बाहर और भीतर लगभग समान हो गई है। पूरा भाजपा कार्यालय जितने कार्यकर्ताओं से भर सकता था भर रहा था लेकिन वहां आनेवाले ज्यादातर लोग मुख्य दरवाजे के आस पास ही सिमटे हुए थे। कुछ इस लिहाज से कि मोदी दर्शन होंगे तो कुछ टीवी पर खुद का दर्शन करने की जुगत लगाये हुए थे। मोदी तो अभी तक भाजपा कार्यालय के भीतर अभी तक नहीं आये थे लेकिन उनके दो आदमकद कट आउट भाजपा कार्यालय के भीतर जरूर पहुंच चुके थे।

छह बजकर बीस मिनट।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का काफिला भाजपा कार्यालय में प्रविष्ट हो जाता है। काफिला क्या है उनकी एक बुलेटप्रूफ स्कार्पियो जीप है और वैसी ही एक दूसरी जीप भी है। साथ में एस्कार्ट का एक दूसरा वाहन भी। फिर भी इस काफिले के भाजपा कार्यालय के भीतर प्रवेश करते ही नेता, पत्रकार और कार्यकर्ता हर आदमी सक्रिय नजर आने लगता है। ढोल ताशेवाले अभी भी अपनी रौं में बह रहे हैं। घण्टों बजाते रहने का उनका अभ्यास साफ दिखाई दे रहा है। पीछे सार्वजनिक सभास्थल पर भाजपा के कार्यालय प्रभारी रहे श्याम जाजू व्यवस्था बनाते हुए दिखने लगते हैं। भाजपा कार्यालय के मुख्य भवन के भीतर क्या चल रहा है यह तो किसी को पता नहीं क्योंकि अंदर किसी के भी जाने की मनाही थी लेकिन अब पीछे बने अस्थाई मंच पर श्याम जाजू प्रकट होते हैं और वे सूचित करते हैं कि जिस घड़ी के लिए आप सब लोग यहां इकट्ठा हुए हैं वह घड़ी बस अब जल्द ही आनेवाली है। वे सार्वजनिक रूप से सूचित भी करते हैं कि मोदी जी भाजपा कार्यालय में पधार चुके हैं।

छह बजकर तीस मिनट।
श्याम जाजू की औपचारिक घोषणा के बाद एक नेतानुमा व्यक्ति माइक पकड़ लेता है जिसके बोलने के अंदाज से वह भी महाराष्ट्र या गुजरात का ही कोई व्यक्ति नजर आता है। जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वाला गाना बंद हो चुका है और वह नेता नारे लगवाता है। अटल बिहारी जिन्दाबाद। नरेन्द्र मोदी जिन्दाबाद। राजनाथ सिंह जिन्दाबाद। यही तीन नारे तीन चार बार लगवाने के बाद वह चुप हो जाता है। लेकिन जैसे उसे तत्काल यह महसूस हो जाता है कि उससे कोई गलती हो गई है। इसलिए वह दोबारा माइक पकड़ता है और आडवाणी जिन्दाबाद के नारे लगाता है। इसके बाद तो उसे जिस नेता का नाम याद आ जाता है उसके जिन्दाबाद का नारा लगवाने लगता है लेकिन बड़ी सफाई से हर नाम के साथ मोदी का नाम जोड़ रहा था। ऐसी नारेबाजी शायद आपने भी कभी नहीं सुनी हो जैसी नयी रचना करके वह आया था। नितिन गडकरी मोदी जिन्दाबाद। राजनाथ सिंह मोदी जिन्दाबाद। सुषमा स्वराज मोदी जिन्दाबाद। अरुण जेटली मोदी जिन्दाबाद। संकेत साफ था अब हर नेता की पहचान मोदी की पहचान से मिल चुकी है।

छह बजकर पैंतालीस मिनट।
मंच के ठीक पीछे बने हाल से निकलकर नरेन्द्र मोदी और राजनाथ सिंह मंच पर आते हैं। वहां मौजूद सैकड़ों लोगों को शायद उम्मीद रही हो कि वे संबोधन भी करेंगे। इसी आस में माइक वाले ने कई बार माइक चेक माइक चेक भी किया था। लेकिन दोनों नेताओं ने दो मिनट से ज्यादा मंच पर नहीं गुजारा। हाथ हिलाकर अभिवादन किया। पोज दिया और जिस तरह भारी धक्का मुक्की के बीच दोनों नेता मंच पर आये थे उसी तरह भारी धक्का मुक्की के बीच वापस चले गये। हां इस बीच मंच के ठीक ऊपर मंडराते चीलों का झुंड भी अब जा चुका था। न जाने कहां से चीलों का यह झुंड ठीक भाजपा कार्यालय के पिछवाड़े बने इस मंच के आसमान में पहुंच गया था और करीब आधे घण्टें तक वहीं मंडराता रहा था। नीचे राजनाथ और मोदी ऊपर चीलों का झुंड कमोबेश साथ साथ ही वहां से विदा हुए।

सात बजकर शून्य मिनट।
जिस तरह भाजपा कार्यालय के भीतर पहली गाड़ी सुषमा स्वराज की अंदर आई थी ठीक उसी तरह उन्हीं की 0008 नंबरवाली होन्डा एकार्ड गाड़ी सबसे पहले बाहर गई। थोड़ी ही देर में पदयात्रा करके बाहर जाते नितिन गडकरी भी दिखे तो कुछ नेता दूसरे दरवाजे से भाजपा कार्यालय से दूर चले गये। करीब घण्टे भर के भीतर जो नेता और कार्यकर्ता अचानक से भाजपा कार्यालय पर उपस्थित हुए थे वे भी रेले की शक्ल में बाहर जाने लगे थे। मोदी की गाड़ी अभी भी भाजपा कार्यालय के भीतर खड़ी थी और खुद मोदी भीतरखाने की राजनीतिक बैठक कर रहे थे। इस बीच कुछ मिठाई के डिब्बे भी घूमने लगे जो मोदी जी को पीएम कैंडिडेट बनाये जाने पर मुंह मीठा करवा रहे थे। पत्रकारों को अलग से पूरा पूरा डिब्बा दे दिया गया था। शायद उनकी मेहनत को देखते हुए उनके लिए यह जरूरी भी था।

सात बजकर पंद्रह मिनट।
नरेन्द्र मोदी का वह काफिला अब आगे जाने के लिए अपनी जगह छोड़कर आगे खिसक जाता है। शायद उन्हें संदेश आ गया था कि वे मुख्य दरवाजे पहुंच जाएं मोदी जी निकलनेवाले हैं।

पिछले करीब छह महीने से भाजपा के भीतर परिवर्तन की जो कवायद शुरू की गई थी वह सवा दो घण्टे में पूरी हो गई। खुद मोदी इन सवा दो घण्टों में सिर्फ गिनती के 55 मिनट शामिल हुए लेकिन इन 55 मिनटों की तैयारी उन्होंने साढ़े पांच साल पहले ही शुरू कर दी थी जिसे आज वे सिर्फ 55 मिनटों में निपटाकर चलता बने। बाद में टीवी ने सूचना दी कि नरेन्द्र मोदी आडवाणी से आशिर्वाद लेने उनके घर भी गये और बीमार अटल बिहारी वाजपेयी के भी घर। लेकिन देर रात ग्यारह बजे तक उनका विशेष विमान वापस गांधीनगर की धरती पर उतर चुका था और दिल्ली से जो हासिल करके लौटे थे उसके स्वागत सत्कार में व्यस्त हो गये थे। ये जो सवा दो घण्टे पीछे छूट गये थे उसमें भले ही देश में मोदी के आने को लेकर उत्साह की नई सोच का संचार कर दिया जाए लेकिन कम से कम भाजपा दफ्तर के भीतर जो भी मौजूद रहे होंगे उन्होंने एक बात बहुत शिद्दत से महसूस की होगी सवा दो घण्टे का यह आयोजन भी पूरी तरह से प्रायोजित था। पता नहीं टीवीवालों ने क्या दिखाया लेकिन मोदी के अलावा वहां से वापस लौटते किसी भी नेता के चेहरे पर परिवर्तन की खुशी दिखाई नहीं दे रही थी।

Tuesday, September 10, 2013

बहुत बलात्कारी है बलात्कार

बिना शक बलात्कार किसी महिला के साथ किया गया सबसे जघन्य अपराध है। लेकिन क्या इस देश को बलात्कारी साबित करने की कोई गंभीर साजिश चल रही है? पिछले कुछ महीनों में बलात्कार के खिलाफ जो सक्रियता और जागरूकता सामने आई है वह काबिले तारीफ तो है लेकिन अब जिस तरह से इस हर प्रकार के शारीरिक संबंधों को बहुत सफाई से बलात्कार की श्रेणी में रखा जाने लगा है वह इस बात की ओर गंभीर सवाल उठाता है कि क्या इसके पीछे कोई गंभीर साजिश चल रही है। यह जो तथाकथित सर्वे आया है संयुक्त राष्ट्र का वह देश के हर चौथे आदमी को बलात्कारी साबित कर रहा है। ऐसा कहकर वे क्या साबित करना चाहते हैं यह तो वे लोग जानें जो इस अभियान में पूंजी लगा रहे हैं लेकिन इस ग्राफिक में प्रेमी या साथी के साथ किये गये सहवास को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है। (जाहिर है सबसे ज्यादा बड़ा ग्राफ उसी का है।) यह निहायत आपत्तिजनक है। अमेरिका और यूरोप में लड़के/लड़कियां डेटिंग करें तो शिष्टाचार यहां ऐसा होता है तो बलात्कार। 


लेकिन सिर्फ साथी प्रेमी के साथ किये गये सहवास को ही बलात्कार नहीं समझाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के ये आंकड़े बताते हैं कि कैसे पड़ोसी, मकान मालिक, रिश्तेदार और यहां तक कि पूर्व पति और कुछ मामलों में सौतेला पिता भी बलात्कार करता है। बलात्कार की ऐसा विश्लेषण करते समय अध्ययनकर्ताओं ने एक बात की पूरी तरह से अनदेखी की है। और वह यह कि क्या अनैतिक संबंध को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा जा सकता है? अगर आप उन्हीं के आंकड़ों को देखें तो कमोबेश सारे अनैतिक संबंध नजर आते हैं। अगर ऐसे संबंध बलात्कार हैं तो तत्काल उनकी शिकायत क्यों नहीं होती है? निश्चित रूप से ऐसे अनैतिक संबंधों का बाद में पछतावा होता है जिसे इस सर्वे में बलात्कार कहकर परिभाषित कर दिया गया है।

दुनिया के जो देश भारत में बलात्कार को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रहे हैं उनकी असली चिंता को उनके अपने ही देश में टीन पोर्न के बढ़ते कारोबार से होनी चाहिए। लेकिन संबंधों की कच्ची समझ को वे अपने यहां किसी और तरह से परिभाषित करते हैं लेकिन जब विकासशील देशों की बात आती है तो वे इसे अपराध की श्रेणी में रखकर देखते हैं। अनैतिक संबंधों का पैरोकार न कभी यह समाज रहा है और न ही हुआ जा सकता है। मध्यकाल के भक्ति आंदोलन में कवियों ने उस भीषण दौर में भी पर नारी के प्रति सम्मान बनाये रखने के तरह तरह के उपाय सुझाये थे और इसे गंभीर पाप बताकर इससे दूर रहने की सलाह दी थी। जाहिर है, ये भक्तिकालीन कवि अपनी तरह के एक समाज सुधार को संचालित कर रहे थे जिसमें स्त्री पुरुष संबंधों की नैतिकता को बहुत शीर्ष पर रखा गया था। 


लेकिन अब जो लोग अनैतिक संबंध को अपराध घोषित कर चुके हैं वे लोग इस देश को नष्ट करके ही मानेंगे। हो सकता है एकदम से यह बात सुनकर यह कोरी गप्प नजर आये कि इन सबके पीछे दुनिया के विकसित देशों की अति विकसित योजनाएं हैं लेकिन योजनाएं हैं और यह सब अनायास नहीं है। बलात्कार की भीषण से भीषण परिभाषा गढ़ी जा रही है और यह यह साबित किया जा रहा है कि इस देश में हर पुरुष बलात्कारी है और हर महिला बलात्कार की शिकार है। सब प्रकार के शारीरिक संबंध को सिर्फ बलात्कार की श्रेणी में क्यों घसीटा जा रहा है?

इस पर बहुत विस्तार से सोचने की जरूरत है कि कैसे बलात्कार के नाम पर छद्म बलात्कार का आवरण खड़ा किया जा रहा है और एक साजिश के तहत शारीरिक संबंध बनाने को इस देश का सबसे बड़ा अपराध बनाया जा रहा है। आखिर क्या कारण है संयुक्त राष्ट्र की सांस सीरिया संकट से ज्यादा भारत के बलात्कार संकट पर अटकी हुई है? अमेरिकी एनजीओ और अकादमिक लोग अपने देश की लंपटई की चिंता छोड़ अचानक भारत के बलात्कार को सुधारने का बीड़ा उठाकर क्यों निकल पड़े हैं? भारत में जो लोग बलात्कार के खिलाफ अचानक बड़े भारी आंदोलनकारी बनकर उभर रहे हैं उनको कहां से पैसा मिल रहा है और क्यों?

अमेरिका और यूरोप ने संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक एजंसियों के जरिए एशिया की परिवार व्यवस्था को नष्ट करने की जो दीर्घकालिक योजना चला रखी है यह सब उसी का नतीजा है। विवाह में सख्त दहेज कानून के कारण पहले ही यह देश उजाड़ हुआ जा रहा है और शादी समाज का सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है और अब विवाह पूर्व या विवाहेत्तर संबंधों को बलात्कार बताकर बहुत योजनाबद्ध तरीके से इस देश को गे और लेसिबियन बनाने की लंबी साजिश शुरू कर दी गई है।

आम आदमी के लिए आई-फोन

आखिरकार एप्पल कारपोरेशन ने सौ डॉलर का सौदा कर ही लिया। अमेरिका के लास एजिल्स शहर में एप्पल कंपनी की ओर से जिन दो नये आईफोन को बाजार में उतारने की घोषणा की गई उसमें आई-फोन 5 सी का 16 जीबी मॉडल अमेरिकी बाजार में 99 डॉलर में उपलब्ध होगा। जबकि इसी फोन का 32 जीबी मॉडल 199 डॉलर में मिलेगा।

एप्पल कंपनी के इतिहास में यह ऐसा पहला मौका है जब उन्होंने कोई ऐसा प्रोडक्ट बाजार में उतारा है जिसकी कीमत बाजार की प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए तय की गई है। लंबे समय से इंटरनेट की तकनीकि दुनिया में कयास लगाये जा रहे थे कि एप्पल कोई बड़ा धमाका कर सकता है। लेकिन इतना बड़ा धमाका कर देगा यह उन तकनीकि विशेषज्ञों को भी अंदाज नहीं था। उनका कयास था कि एप्पल 200 डॉलर से 300 डॉलर के बीच की कीमत वाला 5सी बाजार में ला सकता है जो कि उसके आनेवाले मॉडल 5एस से काफी कम समझा जाएगा। आईफोन का 5सी मॉडल बाजार में उतारने के साथ ही एप्पल ने ऐलान कर दिया है कि अब वह बाजार बनाने में ही नहीं बाजार में खड़े रहने की रणनीति पर काम करना सीख रहा है।

एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स के निधन के बाद एप्पल की ओर से अब तक किसी नये प्रोडक्ट की लांचिग तो एप्पल ने नहीं की है जो तकनीकि की दुनिया को नये सिरे से बदल दे लेकिन बाजार के साथ तालमेल बिठाकर बाजार में मजबूती से खड़े रहने की उसकी कोशिश साफ दिखाई दे रही है।

अमेरिका और यूरोप में 100 डॉलर के आईफोन की क्या मांग होगी यह तो कहना मुश्किल है लेकिन एप्पल के लिए महत्वपूर्ण हो चुके भारत जैसे मोबाइल मार्केट में एप्पल का 5सी नये सिरे से जंग जरूर छेड़ेगा। रूपये और डॉलर की कीमतों और मोबाइल आयात पर लगनेवाले शुल्क, तथा विक्रेताओं के मुनाफे को समायोजित करते हुए एप्पल आईफोन-5सी की कीमत भारत में 20 हजार के आस पास रखी जा सकती है। फिलहाल भारत में एप्पल के तीन आईफोन बाजार में बिक रहे हैं जिसमें आईफोन-4 भी शामिल है जो कमोबेश दुनिया के विकसित बाजार से हटाया ही जा चुका है। लेकिन भारत में आईफोन के क्रेज को देखते हुए यहां आईफोन-4 और आईफोन-4एस बाजार में मौजूद हैं जिनकी कीमत 22 हजार से लेकर 35 हजार के बीच है।

आईफोन-5 भारत में एप्पल का उसी तरह प्रीमियम फोन है जैसे दुनिया के बाजार में है। लेकिन अब जैसी की अफवाहें हैं एप्पल 3.7 इंच की स्क्रीन वाले मोबाइल का उत्पादन बंद करने जा रहा है। इसका कारण यह है कि उसके एप्प डेवलपर को मुश्किल आ रही है। लिहाजा अब एप्पल के सारे आईफोन सिर्फ 4 इंच स्क्रीन में ही मौजूद रहेंगे। ऐसे में आईफोन-4 और आईफोन-4एस के विदा होने के दिन आ गये हैं। जाहिर है इस कमी को एप्पल अपने आईफोन-5सी मॉडल से पूरा करेगा जबकि प्रीमीयम सेगमेन्ट में उसके आईफोन-5 और आईफोन-5एस दोनों पहले की तरह मौजूद रहेंगे। ये सभी फोन रेटिना डिस्प्ले के साथ 4 इंच स्क्रीन साइज में उपलब्ध रहेंगे।

एप्पल के ताजा ऐलान के अनुसार आईफोन-5सी और 5एस दोनों ही फोन में नया आपरेटिंग सिस्टम इंस्टाल किया गया है आईओएस-7। आईफोन 5 सी भले ही एप्पल का आल प्लास्टिक बॉडी फोन हो लेकिन 8 मेगापिक्सल का कैमरा और वीडियो कॉलिंग (फ्रंट फेसिंग कैमरा) देकर इसे थ्री जी कम्पैटिबल बनाया गया है। पांच रंगों में उपलब्ध आईफोन-5 सी एप्पल का ए-6 चिप इस्तेमाल किया गया है। जबकि आईफोन 5एस में ए-7 चिप इस्तेमाल करने के साथ ही पहली बार ट्रैक पैड दिया गया है। यानी एप्पल का होम बटन आईफोन-5एस में बतौर ट्रैक पैड भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। अमेरिका में आईफोन 5एस  आईफोन-5 का अपडेट होगा जो कि 200 से 400 डॉलर के बीच विभिन्न टेलिफोन कैरियर के जरिए बेचा जाएगा।

आफोन के ये दोनों नये मॉडल संभवत:  इस साल के आखिर तक भारतीय बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध करवा दिये जाएंगे। 

Friday, August 30, 2013

बाजारवाद के दौर में परिवारवाद

हमारी सभ्यता के जीवाश्म हैं ये लोग जो जहां तहां बिखरे पड़े हैं। कहीं किसी गांव में। शहर के किसी कोने में न जाने कौन सी लड़ाई लड़ते हुए और वह भी न जाने किससे। ठीक ठीक उन्हें भी पता नहीं है कि वे किससे लड़ रहे हैं। लेकिन लड़ रहे हैं। किसके लिए लड़ रहे हैं, इसका भी कोई बहुत सटीक जवाब उनके पास नहीं है, फिर भी लड़ रहे हैं। लड़ते लड़ते वे लड़ाई ही बन गये हैं। इसलिए अक्सर ऐसे लोग सामने आ जाते हैं तो समझना मुश्किल होता है कि आखिरकार वे समझाना क्या चाहते हैं?

और ऐसे लोग दर्जनों की संख्या में एकसाथ एक ही जगह पर मिल जाएं तो भला? बनिया समाज के दान से बने अग्रसेन भवन के उस हाल में ऐसे ही दर्जनों जीवाश्व इकट्ठा थे। आज के इस आधुनिक दौर में इन्हें इंसान कहना थोड़ा मुश्किल इसलिए होगा कि फिर इंसानों को यह समझाना मुश्किल हो जाएगा कि आखिर इंसान क्या होकर रह गया है? इसलिए ऐसे लोगों को हम जीवाश्व ही मानें जो मानव इतिहास में न जाने कैसे दबे कुचले वैसे ही रह गये हैं जैसी सृष्टि के आरंभ में रहे होंगे।


पहली नजर में उनकी बातें निरा नैतिक लेकिन नैतिकता भी निरुद्देश्य। भारतीय समाज में ऐसे जीवाश्मों की संख्या उतनी ही तेजी से घट रही है जितनी तेजी से ग्लेसियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं। बाजार की गर्मी दोहरी मार कर रही है। आधुनिक समाज ने सभ्यता का जो मायाजाल गढ़ा है उस गढ़े हुए मायाजाल के ये अनगढ़ जीव अदम्य उत्साह से भरे तो दिखाई देते हैं लेकिन अक्सर उनकी बातें वर्तमान के साथ तालमेल खाती दिखाई नहीं देती। अब देखिए न। आज भी वे लोग किसी परिवार जैसी संस्था के बारे में बात कर रहे थे। करीब सौ सवा सौ लोग और सबकी चिंता यही कि परिवार खत्म हो रहे हैं।  नाना विध नाना प्रकार से एक ही विचार। परिवार टूट रहे हैं और इन्हें बचाना बेहद जरूरी है। हालांकि वे सब एक टीवी कार्यक्रम के लिए अपने विचार रिकार्ड करवा रहे थे लेकिन मंच पर तीन विचारकों और नीचे बिखरे दर्जनों विचारकों की चिंता करीब करीब सामूहिक ही थी। 

तो इस सृष्टिगत चिंता के मूल की मूल चिंता क्या है भला? सृष्टि आई तो समाज कैसा था? अरे समाज तो था ही नहीं। तो परिवार रहा होगा। नहीं भाई परिवार भी बाद में बना। तो व्यक्तिगत ईकाई रही होगी। हां, आदम हौव्वा के किस्से तो सुनते ही रहते हैं। तो दो से शुरू हुई दुनिया अगर हम दो हमारे दो पर आकर सिमट गई है तो इसमें बुराई क्या है? सवाल तो सटीक है लेकिन उनके लिए नहीं जो यहां दिखाई दे रहे हैं। वे तो व्यक्ति, परिवार, समूह, समाज जैसी कोई बात कर रहे हैं।

आदम हौव्वा ने क्या खाया और क्या पचाया यह तो मनु सतरूपा जानें, लेकिन मानवीय विकासक्रम में कुछ तो गड़बड़ हो गई। हम दो ने जब हमारे दो पैदा किये तो परिवार बन गया। उन हमारे दो ने आगे और इसी तरह दो दूनी चार किया तो कोई समूह बन गया होगा। फिर समाज भी ऐसे ही किसी तरह औने पौने दाम में निर्मित कर दिया गया होगा। एकांगिकता अधूरी सी चीज लगी होगी उन्हें। इसलिए सोचा होगा सामूहिकता का समुदाय ज्यादा सही सोच साबित होगी। कुछ इतिहासकार तो यह भी कहते हैं सामूहिकता युद्ध के लिए जरूरी थी। सामूहिकता कोई स्वाभाविक विकास व्यवस्था नहीं थी। यह तो युद्ध की मजबूरी थी। समुदायों के बीच संघर्ष ने सामूहिकता की भावना को बल दिया।

अरे, फिर तो यह तो गड़बड़ हो गई। सामूहिकता के समुदाय युद्ध समुदाय में कैसे तब्दील हो गये? बात इतनी गलत इसलिए भी नहीं लगती कि जीते जागते ये जीवाश्म जिस सुप्त विचार को जागृत कर रहे हैं वह यही कि समुदाय बने ही शांति के साथ सहजीवन के लिए थे। आज का ही उदाहरण देख लीजिए। परिवार की ईकाई कमजोर हो गई तो समुदाय और समाज क्रमश: कमजोर हो गये। बदले में जो मजबूत हुआ वह तो वही युद्धोन्मादी राष्ट्र राज्य है जो सीमारेखा का संरक्षक है। ऐसे कैसे हो गया? दो में से तो एक ही बात सही हो सकती है? हम जैसे इंसानों के लिए सचमुच इसकी तह तक पहुंच पाना बहुत मुश्किल है।

लेकिन जो यहां मौजूद थे, उसमें ऊपर मंच पर एकदम दाहिने जो बैठे थे वे कोई राज सिंह आर्य थे। उनके बारे में बताते हैं कि वे वे आर्य समाज की वंश परंपरा के जीवाश्म हैं जो उत्कृष्ट विचारों के साथ अति आधुनिक काल में न सिर्फ धोती कुर्ता पहनते हैं बल्कि कंधे पर एक दुपट्टा या पट्टा भी रखते हैं जिसके भारत में नाना नाम हैं। यह भेष यह भूषा तो आधुनिकता से कहीं मेल ही नहीं खाती। फिर अगर वे संस्कार जैसी बातें करते हैं तो भला हमारे समय के साथ इन बातों का कहां मेल मिलाप हो सकेगा? सोलह संस्कार में बंधा हुआ जीवन तो दकियानूसी सोच है। आधुनिक सोच असंस्कार की बात करती है। जो कुछ मानव सभ्यता ने विकसित किया है, पहला काम है उसे तोड़ दो। फिर सोचेंगे कि इंसान क्या है और उसे क्या करना चाहिए।

बीच में जो बैठे थे वे रामकथा वाचक हैं, विजय कौशल। वे बोल कम रहे थे, सुन ज्यादा रहे थे। लेकिन जो बोल रहे थे, उसमें कर्तव्य और दायित्व बोध जैसी बातें थीं। सामूहिकता की पुकार और एकांगिकता का पूरी तरह से तिरस्कार था। हम जो आजाद पंछी होकर हवा में उड़ जाना चाहते हैं, हमारे लिए इन बातों का कोई मोल हो भी तो हमें पता नहीं। लेकिन उनके बगल में बायीं तरफ वाले बुजुर्ग बजरंग मुनि बता रहे थे सरकार और सरकार के पैरोकारों ने जानबूझकर परिवार के पैर में कुल्हाड़ी मारी है। ताकि वे बांटकर राज कर सकें। बिल्कुल ब्रिटिश हुक्मरानों की तरह। गांधी के कपूत मैकाले के पूत बन गये।

फिर भी, इस जीवाश्मकालीन विमर्श में एक बात जरूर ऐसी थी जो लौटते हुए भी सोचने को विवश कर रही थी कि धुर बाजारवादी अमेरिका में परिवारवाद क्योंकर बकबकाया जाने लगा है? कहीं ऐसा तो नहीं जिन जीवाश्मों को हम जानना सुनना भी नहीं चाहते उनकी आत्मा अमेरिका के अंदर प्रवेश कर गई है? पता नहीं, यह तो शोध का विषय है लेकिन हमारी आधुनिकता पूरी तरह से अमेरिका से उधार ली हुई है, इसे समझने के लिए तो किसी शोध की भी जरूरत नहीं है।

Saturday, August 10, 2013

हाफिज शहीद

बीते आठ महीने में भारत पाक सीमा पर यह दूसरी बार है जब भारतीय सैनिकों की धोखे से निर्मम हत्या की गई है। इसी साल जनवरी महीने में दो भारतीय सैनिकों के सिर काट लिये गये थे और अब पांच भारतीय सैनिकों को रूटीन गश्त के दौरान मौत के घाट उतार दिया गया। इन दोनों घटनाओं के बाद एक बात समान रूप से सामने आई कि सीमा पर भारतीय सैनिकों के साथ इस तरह का कत्लेआम होने से एक या दो दिन पहले सीमा पर रात गुजारकर लौटा है।

हाफिज सईद सीमा पर आता है और उसके एक या दो दिन बाद पाकिस्तान की ओर से कोई दुस्साहसिक कारनामा अंजाम दे दिया जाता है। तब भी और अब भी। सीधे तौर पर तब भी और अब भी पाकिस्तानी सेना ही सामने दिखाई देती है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है और फिर कुछ दिनों में सबकुछ सामान्य हो जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन इस दौरान हाफिज सईद न कुछ बोलता है और न कुछ कहता है। ऐसा संभवत: इसलिए कि वह अपनी अगली योजना पर काम करने के लिए आगे निकल पड़ता है।

प्रो. हाफिज मोहम्मद सईद। पाकिस्तान की समाजसेवी संस्था जमात-उद-दावा का अमीर। पंजाब से लेकर सिंध और अब बलूचिस्तान तक एक समान प्रभावी मुस्लिम आक्रांता। उम्र के 63 बसंत पार कर चुका एक ऐसी शख्सियत जो मोहाजिर मुसलमान की संतान होने के बाद भी मोहाजिर नहीं है। एक ऐसा इंसान जो सिर्फ मुसलमान के जीता है और मुसलमानों के नाम पर पूरी इंसानियत को खत्म करने में उसे कहीं से कोई संकोच नहीं होता है। एक ऐसा शख्स जो पिछले 33 सालों से जेहाद के नाम पर कत्लेआम करवा रहा है। एक ऐसा शख्स जिसके जीवन का सिर्फ एक ही मकसद है और वह मकसद है उसके पुरखों की जमीन हिन्दुस्तान का खंड खंड बंटवारा। वह हिन्दोस्तान के इतने टुकड़े कर देना चाहता है कि गिनने वाले थक जाएं। और, पिछले 33 सालों से वह यही काम कर रहा है।

बांग्लादेश में मिली पराजय के बाद पाकिस्तान में हिन्दोस्तान के प्रति नफरत का जो आलम चढ़ा उसी उफान से हाफिज सईद की पैदाइश होती है। उसने यह तो नहीं देखा था कि शिमला से पाकिस्तान जाते हुए रास्ते में उसके कुल कुनबे के 36 लोगों को किसने और कैसे कत्ल कर दिया था लेकिन उसने वह जरूर देखा था जो बांग्लादेश में हुआ था। पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उसने 1980 में जिस लश्कर-ए-तोएबा (पवित्र लड़ाकों की सेना) की स्थापना की उसका एक ही मकसद था- हिन्दोस्तान के खिलाफ जेहाद। और उसने यह जेहाद बखूबी जारी रखा, 2008 तक। 2008 में मुंबई हमले से पहले वह कश्मीर से लेकर दिल्ली तक सब जगह अपने आतंकी लड़ाके पहुंचा चुका था। आतंक के अपने तीन दशक के इतिहास में उसने इस्लाम के नाम पर इतना लंबा चौड़ा खाका खींच दिया है जिसमें कश्मीर में आजादी की लड़ाई लड़नेवाले हिजबुल मुजाहीदीन हों कि जैश-ए-मोहम्मद, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली आतंकी जमात अल-कायदा हो कि सब आतंकी समूहों की पाकिस्तानी आका आईएसआई सब के केन्द्र में यही एक शख्सियत खड़ा नजर आता है।

पाकिस्तान में वह सिर्फ अब जमात-उद-दावा का अमीर भर नहीं है। लश्कर के इस चीफ ने पूरे पाकिस्तान में जमात की लंबी चौड़ी फौज तैयार कर दी है। निहायत व्यवस्थित और संगठित। आज पूरा पाकिस्तान हाफिज सईद के अमीरों से भरा पड़ा है। जिले और तहसील स्तर तक के अमीर। और उन सब अमीरों में सबसे बड़ा अमीर खुद हाफिद सईद है। उसके चाहनेवालों के लिए खुदा की खुदाई। अमीर की बात को पाकिस्तान में कोई टाल नहीं सकता। सेना तो लंबे समय से उसकी शागिर्द है। अब वह घोषित तौर पर राजनीतिक सुधार के लिए काम करता है लिहाजा चुनावों में उसकी जमात के लोग तय करते हैं कि किसे जन प्रतिनिधित्व देना है और किसे बाहर कर देना है। ऐसे में नवाज शरीफ जैसे नेता भी अमीर के शागिर्दों में शामिल नजर आयें तो कोई आश्चर्य नहीं। वह अमीरों का अमीर है। वह सीधे सद्र तो नहीं है लेकिन आज की तवारीख में अगर पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र है तो उस इस्लामिक राष्ट्र का अघोषित सद्र (राष्ट्रपति) कोई और नहीं बल्कि हाफिज सईद ही है।

लेकिन खुद हाफिज सईद को भी पाकिस्तान में बड़ी खामी नजर आ रही है। इस्लाम के नाम पर मुसलमानों के लिए बना यह देश उसकी अपनी नजर में उतना इस्लामिक नहीं नजर आता जितना होना चाहिए। अभी भी पाकिस्तान में जम्हूरियत का शासन चलता है जो इस्लामिक नियमों के खिलाफ है। इसलिए बीते एक दशक में वह सिर्फ भारत के खिलाफ जेहाद तक ही सीमित नहीं है। वह पाकिस्तान के खिलाफ भी एक जेहाद चला रहा है। पाकिस्तान के खिलाफ चलनेवाला जेहाद वहां की आवाम के लिए है। बीते एक दशक में उसने पाकिस्तान में जितने भी अभियान संचालित किये हैं उन सबके मूल में एक ही बात होती है कि पाकिस्तान में जम्हूरियत (जनतंत्र) जैसी बातें गैर इस्लामिक हैं। इसलिए इस्लामिक नियम कायदों के अनुसार ही शासन व्यवस्था भी बननी चाहिए। हो सकता है, पाकिस्तान के हुक्मरानों को यह लगता हो कि वे जिस पाकिस्तान पर राज करते हैं वह शुद्ध इस्लामिक राष्ट्र है लेकिन अमीर को ऐसा नहीं लगता। इस लिहाज से बीते एक दशक में उसने पाकिस्तान के भी 'शुद्धीकरण' की मुहिम चला रखी है। 'अमीर' सीधे तौर पर सत्ता को अपने हाथ में लेने की तकरीर तो नहीं करता है लेकिन जम्हूरियत और मीडिया को उसकी तरफ से लगातार धमकियां मिलती रहती हैं। यह धमकियां सीधे तौर पर एक ही बात से जुड़ी होती हैं कि अमीर की बात को आखिरी समझो, नहीं तो नतीजे अच्छे नहीं आयेंगे।

अभी अभी तीन चार महीने पहले तक अमीर के लिए अमेरिका दुश्मन नंबर एक था, लेकिन पाकिस्तान में आम चुनाव हो जाने के बाद अचानक ही अमीर का दुश्मन नंबर एक फिर से हिन्दोस्तान बन गया है। पाकिस्तान में आम चुनाव से पहले वह आईएसआई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल के साथ मिलकर दिफा-ए-पाकिस्तान का अभियान चला रहा था जो अमेरिकी कुत्तों को वहां से बाहर फेंकने जैसी तकरीरों से भरी होती थीं। लेकिन आम चुनाव हो जाने के बाद बीते कुछ महीनों से अमीर ने एक बार फिर कश्मीर को अपने एजेण्डे पर वापस ले लिया है। ऐसा संभवत: उसने अफजल गुरू को दी गई फांसी का फायदा उठाने के लिए किया है। फरवरी में अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के बाद अप्रैल से अब तक उसने जितनी मुस्लिम युनिटी कांफ्रेस की है उसमें सिर्फ और सिर्फ कश्मीर का ही मुद्दा उठाया है। एक बार फिर पाकिस्तानी लोगों के सामने बोलते समय वह कश्मीर की आजादी को ही आखिरी अंजाम बताने लगा है। अफजल गुरू की फांसी के बाद उसने जो संपादकीय लिखा था, उसमें लिखा था कि यह निर्दोष मुसलमानों को कत्ल करने का हिन्दोस्तानी तरीका है। तब से वह अपने मुस्लिम युनिटी कांफ्रेस में बोलते समय पाकिस्तानी नागरिकों को समझाता है कि कैसे हिन्दोस्तान में निर्दोष मुसलमानों को कत्ल कर दिया जाता है। अमीर यह जानता है कि अफजल गुरू की फांसी का फायदा कश्मीर में कैसे और किस तरह से उठाया जा सकता है। इसलिए अगर बीते कुछ महीनों में कश्मीर फिर से आतंकवाद की चौखट पर खड़ा नजर आ रहा है तो समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि इन सबके कौन सा अमीर खड़ा है।

भारत के खिलाफ यह अमीर अकेला जितना सक्रिय रहता है उतना तो शायद पूरा पाकिस्तानी हुक्मरान मिलकर भी सक्रिय नहीं रह पाता है। आईएसआई हो कि पाकिस्तानी सेना, भारत के खिलाफ की गई हर कार्रवाई असली कर्ता धर्ता यही अमीर ही होता है। नहीं तो क्या कारण है कि मुंबई हमलावरों को सैन्य कमाण्डरों जैसे ट्रेनिंग की बात सामने आती है और सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सेना भी पाकिस्तानी हुक्मरानों को सुनने की बजाय आकाओं के आका की बात सुनती है? इसका सीधा सा मतलब है कि अमीर पाकिस्तान में सबसे अधिक ताकतवर है। इसलिए हिन्दोस्तान जैसे दुश्मन अगर शासन प्रशासन के साथ मेल जोल बढ़ाना भी चाहें तो अमीर के रहते कभी संभव नहीं हो पायेगी। तो क्या भारत सरकार भी किसी ऐसी योजना पर काम करेगी जिससे पाकिस्तान को इस 'अमीर' से छुटकारा दिलाया जा सके? कुछ कुछ वैसे ही जैसे अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन से पाकिस्तान को मुक्त कर दिया था। पाकिस्तान के हुक्मरानों और मीडिया की भाषा बता रही है कि वे भी इस 'अमीर' को नापसंद करते हैं लेकिन वे उसे बचाने के अलावा और कुछ कर नहीं सकते। 'अमीर' उनके जम्हूरियत की मजबूरी बन चुका है। लेकिन किसी 'अमीर' को लेकर हम इतने मजबूर क्योंकर हो कि वह हमें घायल करता रहे और हम रोज रोज अपना लहू बहाकर घाव चाटते रहें? वह भी तब जब एक घाव भरते ही 'अमीर' दूसरा घाव कर देता है। अगर हमारी एकता, अखंडता और भारत पाक रिश्तों के लिए किसी 'अमीर' की शहादत जरूरी जान पड़े तो उसे शहीद का दर्जा देने में संकोच कैसा?

Thursday, August 8, 2013

गालिब की गली में तालिब

राष्ट्र राज्य की सीमा के भीतर रहकर राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत रहना ही चाहिए। अमेरिका भी रहता है और पाकिस्तान भी। फिर भला भारत के लोग अपने सैनिकों को शहीद किये जाने पर राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत होकर हुंकार उठते हैं तो क्या बुरा करते हैं? उनके हुंकारने फुंफकारने की बारी एक बार फिर आ गई है। पाकिस्तान की ओर से पांच भारतीय सैनिकों को शहीद कर दिया गया है। मामला सोमवार रात का है इसलिए मंगलवार को दिल्ली दहल गई। संसद हिल गई। नेता गणों ने सख्त संदेश प्रसारित कर दिया जो मीडिया से होते हुए उस पाकिस्तान तक भी पहुंचा है जिसने ऐसी नापाक हरकत की है। लेकिन सबसे अधिक चौंकानेवाला खुलासा यह है कि पाकिस्तान की ओर से यह काम एक बार फिर वहां के तालिबान ने किया है, सेना का भेष बदलकर।

इस मंगलवार से भी कुछ पहले बीते शनिवार (27 जुलाई) को भी भारत पाक सीमा पर एक बड़ी घटना हुई थी। भारत के लिहाज से तो शायद नहीं लेकिन एक राष्ट्र राज्य के रूप में पाकिस्तान के लिहाज से वहां की मीडिया के लिए उतना ही बड़ा मुद्दा जितना हमारे पांच सैनिकों को शहीद करने का मुद्दा अब यहां है। 27 जुलाई को भारत पाक सीमा पर रावलकोट के नेजापीर सेक्टर में भारतीय सैनिकों की ओर से की गई गोलीबारी में पाकिस्तान का एक सैनिक शहीद हो गया और एक घायल हो गया। पाकिस्तानी सैनिक की इस शहादत पर पाकिस्तान की ओर से गंभीर कूटनीतिक प्रतिरोध दर्ज कराया गया जबकि भारतीय सेना की ओर से कहा गया कि पाकिस्तानी सैनिकों ने अचानक छोटी मिसाइल और मशीनगन दागनी शुरू कर दी जिसके जवाब में भारतीय सैनिकों ने गोलीबारी की थी। पाकिस्तान में उस दिन यह बड़ी खबर थी, भारत में इस घटना का जिक्र भी नहीं हुआ।

क्यों होता? दुश्मन देश के सैनिक की मौत पर हम भला क्योंकर मातम मनाने लगे? हमें तो पता भी नहीं चला कि सीमा पर ऐसा भी कुछ हुआ है। 27 जुलाई की घटना को राष्ट्रवादी सोच के लिहाज से ''भारतीय सैनिकों के विजय का प्रतीक'' कहा जा सकता था, फिर भी भारत में दुश्मन देश के सैनिक हत्याकांड पर कोई खुशी नहीं मनाई गई। 27 जुलाई की उस गोलीबारी के बाद हमारे लिए बड़ी खबर तब सामने आई जब पांच भारतीय सैनिकों को सैनिक भेषधारी आतंकियों ने सीमा पर हमारे सैनिकों को शहीद कर दिया। इसका कोई प्रमाण तो नहीं हो सकता कि इस काम को उसी 27 जुलाई की घटना के विरोध में अंजाम दिया गया है जिसमें एक पाकिस्तानी सैनिक मारा गया था और एक घायल हो गया था, लेकिन जिस तरह से दोनों घटनाएं पुंछ में ही सामने आई हैं उससे इस संभावना को बल मिलता है कि पाकिस्तान ने सैन्य प्रतिक्रिया में भारतीय सैनिकों को शहीद कर किया है। भारत के छह सैनिकों की यह टोली सीमा पर सामान्य पेट्रोलिंग कर रही थी, जिस वक्त इस भारतीय सैन्य टोली को निशाना बनाया गया। पांच सैनिक शहीद हो गये जबकि एक सैनिक अपनी जान बचाने में कामयाब हो गया।

इस सैन्य शहादत से भी अधिक चौंकानेवाली वह जानकारी है जो संसद में रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने सामने रखी है। संसद में दिये गये अपने बयान में एके एंटनी ने कहा है कि जिन 20 लोगों ने भारतीय सैनिकों को शहीद किया है वे सैन्य वेषधारी आतंकवादी थे। एंटनी हमारे देश के रक्षा मंत्री हैं और यह बात वे कहीं और नहीं बल्कि संसद में बोल रहे हैं तो जाहिर है उनके पास इस बात की पुख्ता सूचना होगी कि भारतीय सैनिकों को शहीद करनेवाले इस काम को अंजाम देनेवाले आखिर कौन हैं। और यह कोई नई बात भी नहीं है। पाकिस्तान में कौन तालिब है और कौन सेना का सिपाही इसका फर्क करना बहुत मुश्किल है। कारगिल युद्ध के समय अगर पाकिस्तानी सैनिक आतंकवादी बनकर अंदर घुस आये थे तो अब वहां के आतंकवादी सेना का भेष बदलकर भारतीय सैनिकों पर हमला कर दें तो पाकिस्तान के बारे में यह कोई परेशान करनेवाली जानकारी नहीं है।

दिल्ली में बैठकर कश्मीर को दिल दे बैठे लोग एक बार फिर वही गंभीर चूक कर रहे हैं जिसका फायदा अब तक पाकिस्तान उठाता रहा है और हम खामियाजा भुगतते रहे हैं। तार्कित कूटनीति का रास्ता छोड़कर हम एक बार फिर कश्मीर में अंधी राष्ट्रभक्ति की तोप चलाने चल पड़े हैं। जिससे तात्कालिक तौर पर राजनीतिक दल चाहें तो फायदा उठा लें लेकिन दीर्घकालिक तौर पर नुकसान ही होगा। रणनीतिक तौर पर देखें तो पाकिस्तान भारत से अधिक चालाक है। वह भारत से अपनी छद्म लड़ाई कश्मीर में लड़ता है और हम इतने 'समझदार' हैं कि हम भी पाकिस्तान से अपनी लड़ाई कश्मीर में ही लड़ते रहते हैं।

पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान इतना धूर्त और कुटिल है कि वह आतंकियों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए जैसे चाहे वैसे कर सकता है। और वह करता भी रहा है। पाकिस्तान में हाफिद सईद आतंकियों का सरगना है कि सेना का सर्वोच्च कमांडर इसे समझ पाना खुद पाकिस्तानी सरकार के लिए भी पूरी तरह असंभव है। जब पाकिस्तानी के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नवाज शरीफ लश्कर-ए-झांगवी से राजनीतिक तालमेल करते हों और उनके भाई शाहबाज पंजाब के कोषागार से करोड़ों रूपया जमात-उद-दावा के कार्यालय के नवीनीकरण पर खर्च करवा देते हों तो समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पाकिस्तान में सेना, सरकार और आतंकवादियों का आपसी रिश्ता क्या है और कैसा है? लेकिन एक बड़ा सवाल यहां और उठता है कि आखिर क्या कारण है कि हाल के दिनों में भारत पाकिस्तान सीमा पर भारत पाक रिश्ता फिर से उसी दौर में पहुंचता जा रहा है जहां से निकलने के लिए दोनों ही देशों ने लंबी कूटनीतिक जद्दोजेहद की है?

इस एक सवाल का तात्कालिक जवाब बहुत नाकारात्मक है। संभवत: इस एक सवाल का जवाब उस एक काम से जुड़ा हुआ है जिसे दिल्ली के तिहाड़ जेल में अंजाम दिया गया। हो सकता है अंधी राष्ट्रभक्ति में हम तार्किकता से घटनाओं को देखना बंद कर दें लेकिन हमारे न देखने से घटनाएं घटनी बंद नहीं हो जाती हैं। कश्मीर की श्रीनगर घाटी जितनी कल भारत की विरोधी थी उतनी ही आज भी है। लेकिन बीते कुछ सालों में भारत विरोध की यह आवाज मध्दम जरूर पड़ती जा रही थी। खुद हमारे प्रधानमंत्री अपने फेसबुक वाल पर अपनी उपलब्धियों में इस बात का जिक्र करते रहे हैं कि कैसे कश्मीर में आतंकवाद कमजोर पड़ा है। इसका कारण कोई कूटनीतिक कौशल न भी रहा हो तो भी, कश्मीरी आवाम की अलागववादी आवाज थकान के कारण ही सही, ढलान पर थी। लेकिन दिल्ली के तिहाड़ जेल में हुई एक फांसी ने अचानक से कश्मीर के हालात को बहुत नाटकीय तरीके से बदल दिया। फांसी के विरोध में जो आवाज मुखर होने निकली थीं, उन आवाजों को भी गले से बाहर नहीं आने दिया गया। हम दूर दराज बैठे राष्ट्रभक्त हो सकता है इसे भी एक सही और सख्त प्रशासकीय कदम मानकर अपने अखंडता पर मौज मना लें लेकिन जिन कश्मीरियों के ऊपर यह सब दमन चक्र चला उन्होंने उसी वक्त दबी जुबान में कहा था कि यह फांसी और इस फांसी के विरोध की आवाज को दबाना, दोनों ही भारत को बहुत भारी पड़ेगा।

और यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं है कि सर्दियों में दी गई उस फांसी के बाद से ही घाटी में भारतीय सैनिकों, अर्धसैनिक बलों पर हमले बहुत तेज हुए हैं। राष्ट्रीय अखबारों में कश्मीर में घुसपैठ की सुर्खियां दोबारा से लौट आई हैं। पिछले तीन चार महीनों में ही घाटी में अब तक करीब आधा दर्जन बड़ी आतंकी घटनाएं घट चुकी हैं। अर्धसैनिक बलों और स्थानीय लोगों के बीच फिर से नफरत का वही रिश्ता सामने आ गया है जिसे मिटाने के लिए कम से कम श्रीनगर घाटी से सैन्य बंकर मिटा दिये गये थे। पहले से कश्मीर में कमजोर पड़ते जा रहे पाकिस्तान के लिए यह एक ऐसा सुनहरा आतंकी मौका था जिसे पाकिस्तानी सैन्य हुक्मरान कभी छोड़ना नहीं चाहेगा। नहीं तो कोई कारण नहीं था कि लंबे अर्से बाद आतंकियों से मुटभेड़ की खबरें आतीं। पिछले तीन महीने में आतंकियों से तीन बड़ी मुटभेड़ हो चुकी हैं जो सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला कर रहे थे। ये आतंकी कहां से पैदा हो रहे हैं, अब हमें शायद यह अंदाज लगाने की भी जरूरत नहीं रही और घाटी में फिर से इन आतंकियों को पनाह क्यों मिलने लगी, इसे समझना भी अब उतना मुश्किल नहीं रहा। कश्मीर घाटी के लोग भारत विरोधी नारे लगाते रहें, पाकिस्तान के लिए इससे सुनहरा मौका और क्या हो सकता है? और तिहाड़ की उस फांसी के बाद से पूरी घाटी ने एक बार फिर वही नारा बुलंद कर दिया जिसे सुनकर हम खुद कश्मीरियों को कमीना कहने लगते हैं। लेकिन दिल्ली की उस फांसी से घाटी में जो बात बिगड़ी तो अब तक बिगड़ती ही जा रही है।

इस बात की उम्मीद अब कम है कि भारत पाक सीमा पर आनेवाले कुछ सालों तक कोई शांति आनेवाली है। और सिर्फ सीमा पर ही नहीं बल्कि समूची घाटी के भीतर अलगाववाद और अंशाति का एक नया दौर शुरू हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। इस अशांति पर काबू पाने के लिए भारत सरकार श्रीनगर को एक बार फिर सैन्य बंकरों में तब्दील कर दे, तो इसे राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा माना जाएगा लेकिन भारत सरकार में बैठे रणनीतिकारों को आज नहीं तो कल यह जरूर सोचना होगा कि गड़े मुर्दे उखाड़े तो नहीं जाते लेकिन अगर मुर्दे गफलत की मौत मरें हों तो उनकी रूहें कभी हमारा पीछा भी नहीं छोड़ती हैं। कल को कोई गालिब भी कहीं तालिब बना नजर आये तो क्या उसके लिए भी हम पाकिस्तान को ही दोषी मानकर उस गालिब के सीने पर बंदूक तान देंगे? बिना यह सोचे कि कभी कोई बाप अपने बेटे को आतंकवादी बनाने के लिए गालिब नाम नहीं दिया करता है।

Monday, August 5, 2013

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

राजनीति में अड़ जाना भी सही होने का सबूत समझा जाता है। राजनीति का पूरा मुलायम कुनबा दुर्गा शक्ति के नाम पर इस वक्त यही सबूत पेश कर रहा है। एक गलत फैसले को अपने अड़ियलपन से सही ठहराने की कोशिश। भीतर भीतर भले ही दुर्गा शक्ति के निलंबन पर ढेरों बहस चल रही हो लेकिन जब बाहर बोलने की बारी आती है तो सब एक सुर में बोलते हैं- जो किया सही किया और अब फैसले से वापस नहीं लौटेंगे। पहले छुटभैय्ये समाजवादी यह बात बोल रहे थे, आज समाजवादे आला कमान ने भी अपनी बात साफ कर दी।
लखनऊ के राजनीतिक मैदान से जो मैसेज भेजा जा रहा था, आज वही संदेश मुलायम सिंह ने भी संसद के गलियारे में बांच दिया। पत्रकारों से बात करते हुए साफ कर दिया कि दुर्गा शक्ति का निलंबन सही है और निलंबन वापस लेने पर कोई विचार नहीं किया जाएगा। मुलायम सिंह यादव ने पत्रकारों से अपनी बातचीत में दुर्गा के निलंबन को विशेष तौर पर 'अखिलेश सरकार का निर्णय' चिन्हित किया। उनका यह चिन्हित करना चौंकानेवाला है। जब आप किसी बात को विशेष तौर पर चिन्हित करते हैं तो वह अनायास नहीं हुआ करता है। इसलिए इतना तो तय है कि यह निर्णय अखिलेश सरकार का जरूर है लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश कुमार का शायद नहीं।

लेकिन खुद मुख्यमंत्री अखिलेश कुमार भी दुर्गा शक्ति के गलत निर्णय को सही ठहराने से कहां पीछे हट रहे हैं। जिस दिन से निलंबन हुआ है उस दिन से एक ही राग अलाप रहे हैं कि जो किया सही किया और उससे पीछे हटने का सवाल नहीं है। बाप जी और बेटे जी का अड़ियलपन अपनी जगह लेकिन चाचा रामगोपाल जो कि अंदरखाने इस निलंबन का विरोध कर रहे थे और भी मुखर होकर सामने आ गये कि केन्द्र अपने आईएएस अधिकारियों को वापस बुला ले वे बिना आईएएस अधिकारियों के ही काम चला लेंगे। रामगोपाल और मुलायम का ताजा अड़ियल रुख दुर्गाशक्ति के सही या गलत होने से ज्यादा केन्द्र के दखल और सोनिया की उस चिट्ठी के कारण है जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा है कि ईमानदार अधिकारी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।

समाजवादी नेताओं का यह अड़ियल रुख साफ तौर पर एक गलत फैसले को सही ठहराने का जरूर है लेकिन इस अड़ियल रुख में क्रमिक कठोरता राजनीतिक मजबूरी की वजह से आती चली गई है। यह तो तय है कि दुर्गा शक्ति का निलंबन सीधे तौर पर खनन माफियाओं को संरक्षण देने के लिए किया गया है। मस्जिद की दीवार गिराने जैसे बहाने तो पैदा किये गये। हकीकत यह है कि समाजवादी सरकार तब भी माफियाओं और गुण्डों की सरकार थी और अब भी उसे माफिया और गुण्डे ही चला रहे हैं। अखिलेश कुमार ने जरूर थोड़ी कोशिश की थी कि समाजवादी पार्टी को नौजवान सभा से जोड़कर साफ सुथरी राजनीति की जाए लेकिन अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता है। अखिलेश की अनिच्छा के बाद भी मुलायम सिंह के दबाव में कई मंत्री ऐसे बना दिये गये जिनका आपराधिक सफरनामा सबके सामने खुला चिट्ठा है। और इन अपराधी मंत्रियों ने आते ही कारनामें भी शुरू कर दिये। राजा भैया और राजाराम पाण्डेय इसी के उदाहरण थे।

किसी भी सरकार में व्यापारी वर्ग ताकतवर स्थिति में रहता ही है क्योंकि सरकार में जो सत्ता तत्व है उसमें व्यापारी बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में जब व्यापार की बात होती है बाहुबल भी साथ में जुड़ जाता है। उत्तर प्रदेश के जितने बाबुबली, माफिया, अपराधी हैं वे सब आला दर्जे के व्यापारी भी हैं। मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, नंदी, विजय मिश्र, अतीक अहमद, गुड्डू पंडित, धनंजय सिंह, राजा भैया सबने अपने आतंक को चाक चौबंद कारोबार में तब्दील कर लिया है। राज्य में जब जिसकी सरकार रहती है ये अपराधी उसी का संरक्षण हासिल कर लेते हैं। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मुख्यमंत्री मायावती हैं कि मुलायम या फिर अखिलेश कुमार। कुछ देर के लिए भले ही ये अपराधी अपनी बिलों में घुस जाएं लेकिन इनका बाहुबल और जुगाड़ तंत्र इतना तगड़ा होता है कि देर सबेर वे सत्ता की मुख्यधारा में लौट ही आते हैं। दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन इसी बाहुबल वाले सत्ता तंत्र का नतीजा है।

लेकिन तमाशा देखिए कि जिस दुर्गा शक्ति के निलंबन पर समाजवादी पार्टी को घुटनों के बल बैठकर जनता से माफी मांगनी चाहिए थी वह अपनी अनीति पर अडिग खड़ी रहकर यह बताने की कोशिश कर रही है कि लोकतंत्र में कठोर निर्णय लिये जाते हैं। फिर वह कठोर निर्णय भले ही माफियाओं, गुण्डों और बदमाशों के हित में ईमानदारी की कीमत पर ही क्यों न लिए जाएं। लेकिन समाजवादी सत्ताधीशों को अपना बनवास अभी भूला नहीं होगा। भूलना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जल्द ही प्रदेश में एक बार फिर आम चुनाव की बयार बहनेवाली है। उनका यह अडिग और अड़ियल रुख उनके लिए कैसी कब्रगाह साबित होगा, इसे देखने के लिए बहुत लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। आखिरकार जनता की स्मृति इतनी भी छोटी नहीं हुआ करती कि छह महीने में ही सब कुछ भूल जाए।

जिया उल हक की हत्या और अब दुर्गा शक्ति का निलंबन ये दो ऐसी बड़ी प्रशासनिक चूक हैं जिससे अखिलेश की समाजवादी सरकार और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी दोनों की चूलें हिल जाएंगी। तिस पर राजा भैया को क्लीन चिट और निलंबन को सही ठहराने जैसी बातें जनता के जले पर नकम छिड़कने का ही काम करेंगी। इन यादवी समाजवादियों को भगवान कृष्ण सत्ता की चलाने की सद्बुद्धि दें, जो खुद अपनी कब्र खोदने में जुटे हुए हैं। इससे ज्यादा कोई और क्या कह सकता है?

Sunday, August 4, 2013

धराशाई हो गई स्काई बस

करीब एक दशक तक हवा में उल्टा लटकाने के बाद स्काई बस को धराशायी करने की घोषणा कर दी गई है। समाचार एजंसी पीटीआई ने खबर करी है कि कोंकण रेलवे अब गोवा में प्रायोगिक तौर पर बने एक मील लंबे रास्ते को जमींदोज कर देगा और इसके साथ ही प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई परियोजना प्रायोगिक तौर पर खत्म भी जाएगी। दो डिब्बों वाली वह स्काई बस जो अब तक गोवा में उल्टी लटकी हुई थी, शायद सीधी करके जमीन पर फेंक दी जाएगी। और इसके साथ ही देश के नक्शे से एक ऐसे प्रयोग का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाएगा जिसके पीछे पूरी तरह से एक भारतीय तकनीशियन का दिमाग और साहस काम कर रहा था। उधार की पूंजी और उधार की तकनीकि के सहारे दुनिया का सिरमौर बनने का दावा करनेवाले इस उभरती महाशक्ति के मुंह पर इसससे करारा तमाचा और क्या हो सकता है?

तब 2003 में गोवा में छुट्टियां बिताने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने गोवा को नये साल का तोहफा दिया था- स्काई बस। गोवा जैसे आधुनिक राज्य के लिए परिवहन की एक ऐसी आधुनिक व्यवस्था दी थी जो कम खर्चीली, पर्यावरण के अधिक अनुकूल और सबसे बढ़कर विशुद्ध भारतीय सोच से उपजी थी। लेकिन 2003 से लेकर 2013 तक यह परियोजना एक मील से आगे नहीं सरक पाई। यह वक्त ठीक वही वक्त था जब उन्हीं अटल बिहारी वाजपेयी ने साल भर पहले 2002 में दिल्ली मेट्रो के लगभग उतने ही लंबे रूट का उद्घाटन किया था। शाहदार से सीलमपुर। शाहदरा से सीलमपुर वाली वह मेट्रो अब अकेले दिल्ली में परिवहन का सबसे मुख्य साधन हो गई है और उसका कुल रूट विस्तार 190 किलोमीटर हो चला है। इसी एक दशक में दिल्ली मेट्रो दिल्ली से निकलकर यूपी, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश में अपने पैर पसार रही है तो स्काई बस एक मील से आगे का रास्ता तय नहीं कर पाई।

दिल्ली मेट्रो और स्काई बस मेट्रो की तुलना का एक बड़ा कारण दोनों ही रेल प्रणालियों के प्रमुखों का नाम है। दिल्ली मेट्रो परिवहन रेल प्रणाली को आगे बढ़ाने का काम श्रीधरन ने किया जबकि स्काई बस मेट्रो के पीछे बी राजाराम का दिमाग और मेहनत थी। दोनों के हिस्से में एक बड़ी परियोजना की सफलता है। रेलवे की वह महत्वाकांक्षी और बड़ी परियोजना थी कोंकण रेलवे। इसी कोंकण रेलवे के चीफ कभी श्रीधरन हुआ करते थे, लेकिन श्रीधर दिल्ली मेट्रो के चीफ बने तो उसके बाद यह जिम्मा बी राजाराम के पास आ गया। दोनों ही तकनीशियन थे और दोनों के खाते में महत्वाकांक्षी कोंकण रेल परियोजना को पूरा करने का समान सम्मान जाता है। लेकिन एक अगर दिल्ली मेट्रो बनाकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ गया तो दूसरा धूल फांकते हुए धूल धूसरित हो गया। ऐसा क्यों हुआ?

ऐसा इसलिए हुआ कि श्रीधरन बड़ी पूंजी के पैरोकार बन गये। उन्होंने एक ऐसी परियोजना को हाथ में ले लिया जिसमें जापान पूंजी निवेश कर रहा था। दिल्ली मेट्रो की तकनीकि ही ऐसी है कि इसका अधिकांश साजो सामान विदेश से लाया जा रहा है। देश में सिर्फ उसकी कोच को असेम्बल कर दिया जाता है वह भी एक जर्मन कंपनी द्वारा। इसलिए दिल्ली मेट्रो की परिवहन प्रणाली को सरकारी और निजी दोनों ही स्तरों पर भरपूर समर्थन और पैसा मिला। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जाने के बाद केन्द्र की सरकार ने स्काई बस मेट्रो से अपना ध्यान हटा लिया और पूरा जोर मेट्रो रेल प्रणाली पर ही लगा दिया। बी राजाराम अपने दम पर हाल फिलहाल तक पूरा जोर लगाकर स्काई बस की प्रणाली को उम्दा और जरूरत के लिहाज से सबसे जरूरी जरूर बताते रहे लेकिन उनकी बात पर किसी ने कान नहीं दिया।

कोई उनकी बात सुनता भी तो कैसे? श्रीधरन खुद स्काई बस की निंदा करते थे। तकनीकि कारणों से भी और व्यावहारिक कारणों से भी। श्रीधरन के विरोध को तब बड़ा आधार मिल गया जब गोवा में स्काई बस हादसा हो गया 2004 में। यह प्रायोगिकता के दौरान हुआ हादसा था जिसमें एक मजदूर की मौत हो गई थी। राजाराम कहते रह गये कि यह हादसा तकनीकि की खामी की वजह से नहीं बल्कि तकनीकिशियनों की लापरवाही से हुआ है लेकिन मानों स्काई बस के विरोधियों को इसी हादसे का इंतजार था। इस हादसे के बाद तो स्काई बस की चर्चा ही चलता कर दी गई। बी राजाराम ने तब भी हिम्मत नहीं हारी और देशभर में घूम घूमकर कहते रहे कि मेट्रो के मुकाबले स्काई बस मेट्रो आधे पैसे में तैयार हो सकती है और वह पूरी तरह से भारतीय शहरों की जरूरतों के अनुकूल है। उन्होंने बीते साल चीफ जस्टिस आफ इंडिया से भी गुहार लगाई कि वे अपनी तरह से संज्ञान लेकर सरकार को परियोजना शुरू करने की ताकीद करें लेकिन न सुप्रीम कोर्ट ने सुना और न ही सरकार को कुछ सुनाया।

और आखिर में जो खबर आई वह यह कि अब सरकार मेट्रो के प्रायोगिक ढांचे को धराशायी कर देगी। पचास करोड़ रूपये की लागत से निर्मित इस प्रायोगिक परीक्षण लाइन को ध्वस्त करने पर तीन करोड़ और खर्च किये जाएंगे जिसका जिम्मा भी उसी कोंकण रेलवे पर डाल दिया गया है जिसने यह प्रायोगिक लाइन बनाई थी। लेकिन क्या इस प्रायोगिक लाइन के धराशायी हो जाने से भारत का वह सपना धराशायी नहीं हो जाएगा जिसे कोंकण रेलवे ने बड़ी शिद्दत से बुना था? दुनिया का इतिहास यही है कि बड़ी परियोजनाओं को पूरा करनेवाले साहसिक निकाय आगे चलकर किसी संस्थान में तब्दील हो जाते हैं और वे दुनिया के विकास को अपने तरीकों से विस्तार देते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे दिल्ली मेट्रो के साथ हुआ है। दिल्ली मेट्रो का विस्तार का मतलब है विदेशी पूंजी और तकनीकि का विस्तार। लेकिन अगर यही स्काई मेट्रो का विस्तार होता तो यह तकनीकि के स्तर पर भारत के भीतर भारत की अपनी तकनीकि का विस्तार होता। अब शायद ही कोई राजाराम तकनीकि का ऐसा साहसिक प्रयोग करने की साहस करे जिसका हश्र आखिर में स्काई बस जैसा कर दिया जाए।

Thursday, August 1, 2013

हंस का ध्वंस

सब कुछ देख सुन लेने के बाद यही दो शब्द शेष रह जाते हैं। मुंशी जी ने अपनी प्रिय साहित्यिक पत्रिका का नाम हंस शायद इसीलिए रखा होगा कि हंस के पास ही नीर क्षीर का विवेक होता है। लेकिन 31 जुलाई 2013 को दिल्ली के ऐवाने गालिब सभागार में जो कुछ हुआ वह उसी नीर क्षीर विवेक के लोप की दास्तान बयान करता है जो दूसरे शब्दों में कहें तो हंस का विध्वंस है। तीन दशक से हंस का संपादन कर रहे राजेन्द्र यादव ने आखिर ऐसी कौन सी खता कर दी थी कि उनके अपने ही उनके ऊपर आक्रांता बनकर टूट पड़े हैं?

क्या मुंशी जी का नाम और काम किसी खास पंथ का बंधुआ मजूर बनकर रह गया है जिसे दूसरा कोई निहार भी नहीं सकता है? किसी गोविन्दाचार्य या फिर किसी अशोक वाजपेयी के मौजूद भर रह जाने से कोई वरवर राव या कोई अरुंधती रॉय इतना नाराज क्यों हो जाते हैं कि आने से मना कर देते हैं? क्या मुंशी जी ने अपने पूरे जीवन जो साहित्य रचा उसका यही एक सूत्र था कि उनके नाम पर एक नागरिक दूसरे नागरिक से इतनी घृणा करे कि मेरे नाम पर भी साथ आने को राजी न हों?

मामला दिल्ली का है और मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर हंस द्वारा आयोजित 28वे कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। 31 जुलाई को प्रेमचंद को याद करने के बहाने राजेन्द्र यादव साहित्यिक जमावड़ा करते हैं हर साल। इस साल भी किया। लेकिन इस साल उनकी उदारता उनके लिए अभिशाप बन गई। वक्ताओं की सूची में उन्होंने दो नाम ऐसे रख लिये गये जिन्हें उस खेमे का नहीं माना जाता है जिस खेमे के राजेन्द्र यादव माने जाते हैं। ये दो नाम थे- गोविन्दाचार्य और अशोक वाजपेयी। एक राजीनीति से समाज में समा चुका है और दूसरा साहित्य का सरल सा नाम भर है। इन दो नामों का बाकी नामों ने इतना मुखर विरोध किया कि राजेन्द्र यादव के लिए उनके ही समर्थक रजाकर होकर सोशल मीडिया पर टूट पड़े हैं। अरुन्धती रॉय और तेलुगु कवि वरवर राव।
अरुन्धती का आरोप कि उनसे बिना पूछे उनका नाम शामिल कर लिया गया। क्या करें? यह तो साहित्यिक धोखाधड़ी है। इसलिए उन्होंने बहिष्कार कर दिया। यह तो राजेन्द्र यादव जाने कि अरुन्धती के बयान में कितनी सच्चाई है लेकिन तेलुगु कवि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली तक आकर ऐवान-ए-गालिब नहीं आये। उनकी चिट्ठी आई। विरोध वाली। लिखा कि ''अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्‍ट क्या है?'' विरोध की इस चिट्ठी में वे जिस परंपरा का जिक्र कर रहे हैं वह जनवादी परंपरा है। जनता को जनता से जोड़नेवाली।  वह जनवादी परंपरा जो कारपोरेट कल्चर का विरोध करती है और एक खास उग्रत्व के उभार का निषेध करती है। खुद को आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में प्रतिबंधित जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा के अध्यक्ष बतानेवाले वरवर राव संवेदनशील कवि भी कहे जाते हैं.

वरवर राव के विरोध और बहिष्कार के अपने तर्क हैं और उन तर्कों से वे पूरी तरह सहमत है लेकिन क्या उनके तर्क इतने लोकतांत्रिक हैं कि उनसे हर कोई सहमत हो चले? वरवर राव जिस गोविन्दाचार्य को हिन्दूवादी घोषित करके उसका बहिष्कार कर चले थे, अब तक उन्हें खबर मिल ही गई होगी कि उस हिन्दूवादी ने भी वही बोला जो बर्बर राव शायद उतनी स्वीकार्यता से नहीं बोल पाते। आखिरकार गोविन्दाचार्य ने भी तो यही कहा कि जेपी के जमाने में जो लोग तानाशाही को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करना चाहते थे आज वे लोग भी आंशिक तानाशाही के समर्थक हो चले हैं? यह आंशिक तानाशाही क्या है इसे बताने की जरूरत नहीं है। तब तो और भी नहीं जब खुलेआम गोविन्दाचार्य नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलते चले आ रहे हों और गुजरात दंगों के लिए दोषी मानने से भी नहीं हिचकते हों?

और दूसरी बात। वरवर राव आते तो वे भी सुनते कि गोविन्दाचार्य के गुरू भी एक कामरेड थे। काशी के कामरेड मोहनलाल तिवारी। गोविन्दाचार्य भले ही साहित्यकार न हों और प्रेमचंद से उनका रिश्ता पाठक भर का हो लेकिन मोहनलाल तिवारी साहित्यकार थे और उसी धारा के साहित्यकार थे जिस धारा के लोग प्रेमचंद को अपना कॉपीराइट मानते हैं। यह संयोग ही कहा जाएगा कि 30 जुलाई को मोहनलाल तिवारी का जन्मदिन होता है और 31 जुलाई को मुंशी जी का। उनके बेटे विवेक शंकर अपने पिता को याद करते हुए बताते हैं कि हर साल 31 जुलाई लमही में ही बीतती थी, अपने पिता के साथ। राजेन्द्र यादव तो बेचारे लमही जाकर प्रेमचंद को नहीं पुकार पा रहे हैं लेकिन मोहनलाल तिवारी लमही में मुंशी जी को पुकारते थे। और पुकारते ही नहीं थे, उनके पूरे जीवन में वामपंथ ऐसा समाया था कि उनकी साहित्य रचना का आधार समतामूलक समाज ही बना रहा। उन स्वर्गीय मोहनलाल तिवारी का अगर गोविन्दाचार्य ने अपने गुरू के बतौर जिक्र किया तो क्या गुनाह कर दिया?

वरवर राव की चिट्ठी को आधार बनाकर बहुत सारे कामरेड सोशल मीडिया के मैदान में कूद पड़े हैं। उन्हें बहस करने की अच्छी आदत होती है। वे बहस करेंगे। भांति भांति से बहस करेंगे। तर्कों के अंबर तले कुतर्कों का अंबार लगायेंगे लेकिन क्या कोई यह बताएगा कि छूआछूत की यह बर्बर परंपरा उस ब्राह्मणवाद से किस तरह भिन्न है जिसके विनाश के लिए समूचे समतामूलक विचार को धारा में तब्दील कर दिया गया है? अगर धाराएं इतनी संकीर्ण और तंग घाटियों से गुजरती हैं तो विचार के लिए जगह कहां बचेगी? और किसी धारा से विचार ही गायब हो गया तो उस धारा के साथ बहनेवाले वाले लोग बहते हुए कहां चले जा रहे हैं? अगर वरवर राव खुद अपनी चिट्ठी में यह कहते हैं कि अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित किया जा रहा है तो उनका यह बहिष्कार क्या कौन सी स्वीकारोक्ति है? अगर सब अपने अपने दायरे में दूसरों का प्रवेश वर्जित कर सकते हैं तो फिर किसी सिरफिरी सरकार और वरवर राव में फर्क क्या रह जाता है?

हंस तो विवेकशील है। उसको क्या फर्क पड़ता है कि दूध में कितना पानी है कि पानी में कितना दूध है? वह तो क्षीर का साथी है, उसे नीर से भला क्या काम? और अगर हंस का यही विवेक जाता रहा तो वह हंस कितना हंस रह पायेगा? सवाल राजेन्द्र यादव से नहीं लेकिन उन वरवर राव और अरुन्धती राय से जरूर पूछा जाना चाहिए जिन्होंने मुंशी जी के हंस के विध्वंस का काम किया है।

Tuesday, July 30, 2013

तेलंगाना को तथास्तु!

तकनीकि रूप से तो तेलंगाना भले ही अभी भी अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नहीं आया है लेकिन राजनीतिक रूप से तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया है। पिछले चार पांच दिनों से कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक कवायद को आज दो महत्वपूर्ण बैठकों में अमली जामा पहना दिया गया। पहली बैठक तथाकथित रूप से उस यूपीए की हुई जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं और दूसरी बैठक उस कांग्रेस वर्किंग कमेटी की हुई जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं।

इन दो राजनीतिक बैठकों में अलग तेलंगाना राज्य के गठन पर लगी मोहर के बाद एक तीसरी विशेष बैठक बुधवार को प्रधानमंत्री निवास पर होगी जिसे कैबिनेट  मीटिंग कहा जाता है और उस कैबिनेट मीटिंग में तेलंगाना राज्य को अलग से स्थापित करने की औपचारिक घोषणा कर दी जाएगी। इसके बाद अधिकारियों और कर्मचारियों की अंतहीन बैठकें होंगी जिसमें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच बंटवारे का हिसाब किताब किया जाएगा।

लेकिन यूपीए, कांग्रेस और कैबिनेट की इन बैठकबाजियों के बीच एक ऐसी आशंका भी आला नेताओं के मन में घर कर गई है कि अलग तेलंगाना कहीं खुद कांग्रेस के गले की फांस न बन जाए। इसलिए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण रेड्डी को बुलाकर उन्हें समझा दिया गया है कि अलग तेलंगाना क्यों बहुत जरूरी हो चला है और कल तक इस्तीफे की धमकी देनेवाले किरण कुमार रेड्डी आज अपने बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलील दे रहे हैं। हो भी सकता है कि रेड्डी के बयान को मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया हो लेकिन जिस राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए कांग्रेस ने चुनाव से पहले तेलंगाना राज्य पर अपनी सहमति दी है उसका फायदा मिलना भी शुरू हो चुका है। तेलंगाना राष्ट्र समिति की सांसद और तेलुगु की मशहूर अभिनेत्री रह चुकीं विजयाशांति ने घोषणा कर दी है कि वे अब कांग्रेस में जा रही हैं क्योंकि कांग्रेस ने वह कर दिया है जो उसे बहुत पहले कर देना चाहिए था।

अलग तेलंगाना की जो रुपरेखा सामने आई है उसमें कुछ संभावित विवादों को अभी से दरकिनार करने की कोशिश की गई है। जिस वक्त एनडीए शासनकाल के दौरान तीन अलग राज्यों के गठन की घोषणा की गई थी उस वक्त उत्तराखण्ड को निर्मित करते समय दो बड़ी गलतियां कर दी गई थीं। एक, उत्तराखण्ड का नाम उत्तरांचल कर दिया गया था और दूसरा पहाड़ के राज्य में न जाने किस दिमाग से मैदान के दो जिले भी शामिल कर दिये गये थे। एक गलती तो सुधार दी गई लेकिन दूसरी गलती की सजा उत्तराखण्ड आज भी भुगत रहा है। कुछ इसी तर्ज पर पहले रायलसीमा तेलंगाना बनाने की योजना थी, जिसे खारिज कर दिया गया और अब सिर्फ तेलंगाना गठित करने का प्रस्ताव मंजूर किया गया है। इसी तरह हैदराबाद के मुद्दे पर भी जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक हैदराबाद को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने की बजाय उसकी महानगरपालिका वाली हैसियत बरकरार रखी जाएगी और आंध्र और तेलंगाना के बीच उसका बंटवारा कर दिया जाएगा।

कांग्रेस ने अपने चुनावी मकसद को पूरा करने के लिए जिस तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी दी है उस तेलंगाना में कुल दस जिले होंगे। ग्रेटर हैदराबाद, रंगारेड्डी, मेडक, नलगोंडा, महबूबनगर, वारंगल, करीमनगर, खम्मम, आदिलाबाद और निजामाबाद। किसी दौर में निजाम का निजाम रहे भारत के प्रस्तावित इस 29वें राज्य की 3.5 करोड़ की आबादी में 85 प्रतिशत से अधिक आबादी हिन्दू है। राम और देवी के प्रति अगाध श्रद्धा रखनेवाले तेलंगाना क्षेत्र में 12 प्रतिशत मुसलमान और 1 प्रतिशत ईसाई हैं। तेलंगाना की मुख्य भाषा तेलुगु है लेकिन यहां 12 प्रतिशत लोग उर्दू भी बोलते हैं लिहाजा उर्दू को दूसरी प्रमुख भाषा का दर्जा प्राप्त है। हिन्दू बहुल आबादी वाला तेलंगाना राज्य उत्सवधर्मी राज्य है और कमोबेश सालभर यहां कोई न कोई धार्मिक उत्सव चलता रहता है। नवरात्रि के दौरान चलनेवाला बथुकअम्मा उत्सव में स्थापित होनेवाला कलश तो तेलंगाना आंदोलन का प्रतीक ही बन गया था जब सात दिनों तक तेलंगाना वासी साक्षात देवी की उपासना करते हैं। अबकी नवरात्रि में जरूर यह उत्सव ज्यादा धूमधाम से मनाया जाएगा।

तेलंगाना के गठन से आंध्र प्रदेश के 294 सदस्यीय विधानसभा से 119 विधायक और 42 सदस्यीय लोकसभा से 17 सांसद कम हो जाएंगे। ये 119 विधायक और 17 सांसद अब तेलंगाना राज्य के तहत जनप्रतनिधित्व करेंगे। सवाल यह है कि तेलंगाना गठन के बाद इन 119 विधायकों और 17 सांसदों से क्या कांग्रेस को वह मिल पायेगा जिसके लिए उसने शेष 175 विधायकों और 25 सांसदों को दांव पर लगा दिया है? राजनीतिक नजरिए से देखें तो सवाल नाजायज नहीं है। क्योंकि राजनीतिक रूप से तेलंगाना सिर्फ तेलंगाना आंदोलन की भारी मांग पर पर स्वीकार नहीं किया है। जिस यूपीए और कांग्रेस वर्किंग कमेटी की अलग अलग बैठकों ने तेलंगाना के गठन को राजनीतिक मंजूरी दी है उस यूपीए और कांग्रेस के तीसरे कार्यकाल का बहुत कुछ दारोमदार दक्षिण में इसी तेलंगाना पर टिका रहेगा। कोई और जाने न जाने तेलंगाना के मुद्दे पर यूपीए और कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठकों की अध्यक्षता करनेवाली सोनिया गांधी इस बात को बखूबी जानती समझती हैं।

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