Sunday, January 31, 2016

दहेज नहीं मांगा लेकिन अब मौत मांग रहे हैं दीनदयाल

उन्होंने दहेज तो नहीं मांगा लेकिन अब वे मौत मांग रहे हैं। जिन्दगी पाने की जिस ख्वाहिश में दीनदयाल ने अपने बेटे की शादी की थी उसी शादी ने आज उन्हें मौत मांगने पर मजबूर कर दिया है। अदालत, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाकर थक चुके बूढ़े दीनदयाल अपनी बुढिया के साथ अब राष्ट्रपति के दरवाजे पर खड़े हैं। वही राष्ट्रपति जो कानूनों पर अपनी अंतिम मोहर मारता है। राष्ट्रपति के द्वारा ऐसे ही एक मुहरबंद कानून का शिकार दीनदयाल शर्मा भी हो गये हैं। दहेज उत्पीड़न कानून। देश के लाखों बुजुर्गों में से एक जो इस कानून के "एक और" शिकार हुए हैं।

दीनदयाल शर्मा दिल्ली के यमुना विहार कालोनी में रहते हैं। 2003 में अपने एयरफोर्स अधिकारी बेटे की शादी एक फौजी की बेटी से किया था। बहू आयी। रानी बनकर रही। एक बेटा भी हुआ। छह साल कब बीत गये किसी को पता न चला। फिर छह साल बाद अचानक से बहू घर छोड़कर मायके चली गयी। इसके बाद वही हुआ जो आमतौर पर एक सामान्य हिन्दू परिवार का सबसे बड़ा डर बन गया है। बहू ने 2012 में दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करा दिया और बीते तीन सालों से अब उनकी अपनी बहू और पोते से कोर्ट में ही मुलाकात होती है।

दीनदयाल कह रहे हैं कि जब छह साल दहेज नहीं मांगा तो छठे साल में ऐसा क्या हो गया कि बहू ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा दिया? दीनदयाल के मुताबिक बहू ने मांग रखी थी कि घर उसके नाम कर दिया जाए जिसे सास ससुर ने नहीं माना। हो सकता है बेटे ने बीबी का साथ देने की बजाय अपने मां बाप का साथ दिया और बात बिगड़ गयी। बहू मायके चली गयी। तकरार बढ़ती चली गयी और मामला अदालत में उलझ गया है। किसी सत्तर साल के बुजुर्ग के लिए रोज रोज कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना सिर्फ इस उम्मीद में कि एक दिन उसे निर्दोष साबित कर दिया जाएगा कोई सम्मानजनक कर्म नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति के घर गुहार लगायी है कि उन्हें और उनकी पत्नी को मरने की इजाजत दे दी जाए।

हो सकता है दीनदयाल इतने भी निर्दोष न हों जितना वे बता रहे हैं लेकिन वे उतने भी दोषी नजर नहीं हो सकते जितनी उनको सजा मिल रही है। और दीनदयाल अकेले ससुर नहीं रह गये हैं जो बेकसूर होकर भी सजा भुगत रहे हैं। साठ के दशक में जब से भारतीय दंड संहिता में धारा 498A जोड़ा गया है लाखों परिवार इस कानून की भेंट चढ़ चुके हैं  एक से एक दर्दनाक कहानियों से बीते चार दशक का इतिहास भरा पड़ा है। इस कानून के कारण दहेज उत्पीड़न में कोई कमी आई हो इसका कोई खास लक्षण अब तक नहीं दिखा है लेकिन इस कानून के कारण न जाने कितने दीनदयाल अकाल काल के गाल में समा गये हैं इसके लाखों उदाहरण हैं।

नब्बे के दशक में इस कानून का सबसे ज्यादा आतंक था। बड़े पैमाने पर नौजवानों ने आत्महत्याएं की और परिवार भी बर्बाद हुए लेकिन मुख्यधारा के समाज के लिए यह कानून कभी मुद्दा नहीं बना उल्टे यूपीए सरकार ने नारीवादियों के दबाव में सात साल तक प्रभावी रहनेवाले इस कानून की समयसीमा बढ़ाकर आजीवन कर दिया। मतलब अब महिला किसी भी समय ससुरालवालों पर दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा सकती है। शादी के दस, बीस, पचास साल बाद भी।

जाहिर है ऐसे प्रावधानों का मकसद दहेज प्रताड़ना को समाप्त करना बिल्कुल नहीं है। इनका मकसद कुछ और है और वह मकसद इसी बात से हल होता है कि भारत की परिवार व्यवस्था का आधार विवाह इतना विवादित बन जाए कि लोग विवाह के नाम से खौफ खायें। भारत में दहेज उत्पीड़न कानून असल में विवाह उत्पीड़न कानून है जिसका मुख्य मकसद परिवार व्यवस्था का विघटन और जनसंख्या नियंत्रण है। लेकिन यह उस कानून का छिपा हुआ रूप है जिसे समझ पाना इतना आसान नहीं है। जो संस्थाएं ऐसे कानूनों की वकालत करती हैं उनके दानदाताओं की सूची देखिए। आपको सब समझ में आने लगेगा कि भारत के नारीवादी एनजीओ क्या खाकर ऐसे परिवार विरोधी, समाज विरोधी कानूनों की पैरवी करते हैं।

दहेज रूपी अनिवार्य बुराई से निपटने के लिए कानूनी या सामाजिक उपाय करने की बजाय हमने शुरूआत से ही गलत रास्ता चुना। एक सामाजिक बुराई का निदान हमने क्रिमिनल कानून से करने की कोशिश की। किसी विवाहिता स्त्री को दहेज के कारण प्रताड़ित किया जाए, मार दिया जाए, यह अपराध कारण नहीं बल्कि परिणाम है। हमें परिणाम की इतनी चिंता थी कि जोरदार कानून बना दिया लेकिन कारण को नष्ट करने की कोई खास पहल नहीं की गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि दहेज प्रताड़ना का कानून खुद एक कानूनी प्रताड़ना बन गया। बीते चार पांच साल का आकड़ा देखें तो पता चलता है कि औसतन हर साल दस हजार केस झूठे पाये जाते हैं। ये वो केस हैं जो पुलिस के स्तर पर तफ्शीश में गलत पाये जाते हैं। लेकिन अगर अदालतों का जायजा लें तो पानी सर के ऊपर निकल जाता है।

सौ में नब्बे मामले जो दहेज उत्पीड़न से दर्ज किये जाते हैं उनके पीछे कारण दहेज नहीं बल्कि और कुछ होता है। पारिवारिक झगड़े, पति पत्नी की अनबन या फिर ऐसे ही मामले जिसमें लड़की और उसका परिवार दहेज उत्पीड़न कानून को एक हथियार की तरह "सबक सिखाने" और "बर्बाद करने" के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बर्बादी इस कदर बढ़ गयी कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक हिल गये इसलिए बीते दो तीन सालों में अलग अलग हाईकोर्ट और खुद सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन निकाली है ताकि इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके। इसलिए दहेज उत्पीड़न के ज्यादातर मामले अदालत पहुंचते ही मेडिएशन सेन्टर भेज दिये जाते हैं जहां दोनों पक्ष आपस में बात करके सुलह समझौता कर सकते हैं। लेकिन यह सब होते होते पीड़ित परिवार पुलिस और वकीलों का शिकार बन चुका होता है।

जिस देश में अदालती प्रक्रिया ही वास्तविक सजा हो उस देश में कानून का इस्तेमाल न्याय पाने के लिए नहीं बल्कि सजा देने के लिए किया जाता है। हमारे यहां भी यह कानून न्याय पाने का हथियार न होकर सजा देने का औजार हो गया है। केस दर्ज होते ही पीड़ित परिवार दो चार साल के लिए अदालतों का मुलाजिम होकर रह जाता है। इस कानून में महिला के नाम पर सिर्फ विवाहित स्त्री के अधिकार की रक्षा की गयी है जबकि वही महिला इस कानून का दुरुपयोग सिर्फ पुरुषों के खिलाफ ही नहीं सास, ननद, देवरानी, जेठानी सबके खिलाफ इस्तेमाल करती है। हालांकि तमाम हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब कई तरह के बचाव के उपाय किये गये हैं लेकिन वे सब नाकाफी हैं।

वक्त आ गया है कि महामहीम राष्ट्रपति पचास साल बाद इस कानून की व्यापक समीक्षा करवायें और इसकी जरूरत को देखते हुए अगर इसे बनाकर रखना भी चाहें तो इसमें बदलाव करवायें नहीं तो दीनदयाल को अकाल मौत मरने की इजाजत दे दें। क्योंकि जिस परिवार के खिलाफ गैरकानूनी तरीके से यह कानून इस्तेमाल कर दिया जाता है जिन्दा तो वो तब भी नहीं रह पाता है।

Sunday, January 24, 2016

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान

एक कम्युनिस्ट पार्टी पाकिस्तान में भी है। सीपीपी। कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान। पाकिस्तानी कामरेडों का इतिहास तो है लेकिन कोई भूगोल नहीं है। अड़तालीस में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने कलकत्ता में अपनी एक शाखा आजाद हो चुके पाकिस्तान में खोलने का निर्णय लिया और उर्दू के मार्क्सवादी कवि सज्जाद ज़हीर उर्फ बन्ने मियां को पाकिस्तान में वर्गविहीन समाज के स्थापना की जिम्मेदारी मिली। बन्ने मियां के पिता अवध के चीफ जस्टिस सर सैयद वजीर हसन के बेटे थे जो कि मूल रूप से जौनपुर के निवासी थे।

कवि कॉमरेड बन्ने मियां को पाकिस्तान में एक जबर्दस्त साथी मिले, फैज अहमद फैज। दोनों ही शानदार शायर थे और दोनों भारत में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोशिएशन से जुड़े हुए थे। लेकिन पाकिस्तान में इन प्रगतिशील शायरों के साथ जबर्दस्त ज्यादतियां की गयीं और छह साल के भीतर ही समूचा प्रगतिशील आंदोलन शीलबंद कर दिया गया। 1951 में लियाकत अली खान की सरकार का तख्तापलट करने के आरोप में फैज साहब और सज्जाद जहीर सहित दर्जनों कॉमरेड नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप लगा कि वे सोवियत संघ की मदद से पाकिस्तान में तख्ता पलट करना चाहते थे।

कुछ समय बीतने के बाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तरफ से कूटनीतिक हस्तक्षेप किया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि सज्जाद जहीर सहित कुछ कॉमरेड कैद से रिहा किये गये और उन्हें भारत को सौंप दिया गया। वापस लौटकर सज्जाद जहीर ने दोबारा से प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का काम दोबारा शुरु कर दिया। उधर पाकिस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी और सारा प्रगतिशील आंदोलन छह साल की उम्र में ही कब्र में दफन हो गया।

लेकिन कब्र में करीब 58 साल दफन रहने के बाद 2013 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान के ऊपर से प्रतिबंध हटा लिया गया और अब गिने चुने कामरेडों की जमात आनलाइन दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। हालांकि अभी भी जमीन पर जीरो ताकत रखनेवाले पाकिस्तानी कॉमरेड सिर्फ बयान जारी करने तक सीमित हैं लेकिन उनके बयान भी किसी क्रांति की आहट नहीं देते। उन प्रेस विज्ञप्तियों को देखकर लगता है कि वे पाकिस्तान में कम्युनिस्म का एक इस्लामिक संस्करण विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इस बार उनके ऊपर रावपिंडी कांस्पेरिसी जैसा कोई केस न बने जिसके कारण सीपीपी को 58 साल पाकिस्तानी लोकतंत्र की कालकोठरी में गुजारने पड़े थे।

Monday, January 18, 2016

रोहित की अकाल मौत पर राजनीतिक मातम

मौत से दुखद घटना दूसरी कोई नहीं होती लेकिन जवान की मौत हो जाए तो वह मौत बहुत दर्दनाक होती है। अगर यह मौत आत्महत्या हो तो इस दुख की कोई परिभाषा नहीं की जा सकती। देख सुनकर आप निशब्द रह जाते हैं लेकिन उस दुख को कौन सा नाम दें जो किसी ऐसी असह्य मौत पर विचारधाराओं के राजनीति का तांडव करती हो?

रोहित की मौत ऐसी ही त्रासदी है। एक होनहार और संवेदनशील नौजवान ने आत्महत्या कर ली। एक ऐसा नौजवान जो साहित्य सृजन करना चाहता था। उस आखिरी चिट्ठी को पढ़िये जो उसने जाने से पहले लिखा है। हर शब्द से संवेदनशीलता छलकती है। हालांकि उन्होंने यह नहीं लिखा है कि वे आत्महत्या किस विशेष कारण से कर रहे हैं और न ही किसी को दोषी ठहराया है।

यह काम विचारधारा वााले कर रहे हैं और उन्हीं रोहित के नाम पर जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उन्हें विश्वविद्यालय के छात्रावास से निकाल दिया गया था। क्यों निकाल दिया गया था इस बहस में जाने की जरूरत नहीं है लेकिन उनकी चिट्ठी से इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता है कि उन्हें विश्वविद्यालय से निकाला गया इसलिए वे आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने इस बात का भी कहीं कोई जिक्र नहीं किया है कि किसी व्यक्ति या समूह विशेष के व्यवहार से पीड़ित थे। उनकी चिट्ठी से जो ध्वनि निकलती है वह यह कि वे हताश हैं और निराशा के किसी ऐसे मुकाम पर हैं जहां से आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। वे लिख रहे हैं "मैं इस वक्त पीड़ा में नहीं हूं. मैं दुखी नहीं हूं. मैं बस खाली हो गया हूं. अपने बारे में चिंताविहीन. यह बहुत शोचनीय बात है. और इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं."

सचमुच वह बहुत भयावह स्थिति होती जब आप जिन्दगी में खाली हो जाते हैं, अकेले पड़ जाते हैं या फिर बेमतलब बन जाते हैं। अपने पत्र में वे लिखते भी हैं कि " मेरा जन्म मेरे लिए घातक हादसा है. मैं कभी अपने बचपन के अकेलेपन से उबर नहीं पाया. भूतकाल में मैं कभी प्रोत्साहित न किया जाने वाला एक बच्चा था।" यहां से आगे का एक रास्ता नयी सुबह होने का इंतजार करता है तो दूसरा रास्ता मौत के अंधे कुएं की तरफ खींचकर ले जाता है। हालात चाहे जो रहे हों रोहित ने नयी सुबह को देखने का इंतजार नहीं किया। तो क्या वे विश्वविद्यालय से निकाले जाने के कारण तन से ही नहीं, मन से भी खुले आसमान के नीचे आ गये थे जहां कोई सहारा न बचा था?

उनके विश्वविद्यालय से निकाला जाना एक कारण हो सकता है लेकिन यही एकमात्र कारण रहा होगा यह समझ पाना मुश्किल है। उनकी बेहद संवेदनशील बातों का सिरा जिस निराशा से जुड़ता है वह वैचारिक तिरस्कार से ज्यादा जीवन में प्यार के अभाव का इशारा करता है। अपने आखिरी पत्र में वे ऐसी पंक्ति भी लिख रहे हैं जो बहुत महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं "हमारी मौलिकताएं कृत्रिम कलाओं द्वारा स्वीकृत हैं. सच में यह असंभव हो गया है कि किसी को बिना दुख पहुंचाये भी उसे प्यार किया जा सके." आखिर वह कौन है जिसे रोहित का प्यार भी दुख पहुंचा रहा था? क्या यह समाज? विचारधारा या फिर कोई व्यक्ति?

उनका पत्र पढ़कर इतना तो साफ समझ आता है कि वे संवेदना के सागर थे। वे किसी विचारधारा में सीमित रह जानेवाली संभावना नहीं थे। उनकी कल्पनाओं का आकाश अनंत था और किसी मान्यता के दायरे में बंधे हुए व्यक्ति नहीं थे न ही किसी मान्यता को अंतिम समझने वाले थे। समाज में फैली हुई या फैलायी गयी किसी भी धारणा और मान्यता को खारिज करते हुए वे लिखते हैं " हमारी भावनाएं सेकेंड हेंड हैं. हमारा प्यार गढ़ा हुआ है। हमारी मान्यताएं रंग-रोगन वाली हैं।" यह किसी संवेदनशील व्यक्ति की गहराई का चरम है।

लेकिन रोहित की मौत के बाद जिस तरह से वितारधारा का खेल खेला जा रहा है और एक संवेदनशील सरस हृदय नौजवान की मौत को किसी खास वर्ग और समुदाय के खिलाफ साजिश बताया जा रहा है यह उस अकाल मौत को काल कलवित कर रहा है। रोहित की आखिरी चिट्ठी को गौर से पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि वे दलित विचारधारा के दायरे में बंधे हुए नौजवान नहीं थे भले ही वे उस विचारधारा के बीच रहकर काम कर रहे हों। निश्चित रूप से वे एक उन्मुक्त जीव थे और ऐसे लोग किसी विचारधारा के दायरे में बंधने की बजाय सत्य को समग्रता में समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों की क्षति किसी विचारधारा की क्षति नहीं और न ही मुद्दा होता है। यह मानवता की क्षति है। समूची इंसानी प्रजाति की क्षति जिसकी कोई पूर्ति नहीं हो सकती। किसी कीमत पर नहीं। किसी सूरत में नहीं।

Sunday, January 17, 2016

आतंकवाद का इस्लाम

इधर भारत में बैठे मीडिया के लोग हाफिद सईद और मसूद अजहर के बारे में इस तरह की तस्वीर पेश करते हैं जैसे वे लोग पाकिस्तान के मुजरिम हैं, और पाकिस्तान उन्हें गिरफ्तार करके फांसी दे देगा इस तरह आतंकवाद के खिलाफ उसकी कार्रवाई का वादा मुकम्मल हो जाएगा। लेकिन वे पाकिस्तान के मुजरिम नहीं बल्कि हीरो हैं। मौलाना हैं। अमीर है। उनका जो जुर्म हमारी नजरों में उन्हें मुजरिम बनाता है उन्हीं जुर्मों की बदौलत वे पाकिस्तान के एक बड़े वर्ग में सम्मान की नजर से देखे जाते हैं। वे लोग वह काम कर रहे हैं जो करने का हुक्म उनकी कुरान में हैं। जो काम उनके नबी मोहम्मद साहब ने किया, उसी "पवित्र काम" को वे भी आगे बढ़ा रहे हैं। जिहाद के नाम पर हथियार उठाने के हुक्म उनके आका (मोहम्मद साहब) ने उन्हें दिया है इसलिए वे जो कुछ आतंकी वारदात करते हैं वह शुद्ध इस्लामिक है। अगर कोई मुस्लिम या गैर मुस्लिम उनको इस काम से रोकता है तो वह नबी के फरमान के साथ नाफरमानी करता है।

मौलाना मसूद अजहर हो या फिर मौलाना हाफिज सईद। ये दोनों ही इस्लामिक अध्ययन के बड़े विद्वान हैं। हाफिज सईद तो सेना में दीनी तालिम देता था जबकि मसूद अजहर ने भारत के खिलाफ अपना जिहादी कैरियर भी बतौर आलिम शुरु किया था। अफगानिस्तान के जिहादी जंग से घायल होकर लौटने के बाद उसने कश्मीर में सक्रिय होने के लिए एक इस्लामिक अखबार निकालना शुरु किया था। आज भी अपना नियमित मुखपत्र (माउथपीस) प्रकाशित करता है और आधा दर्जन से अधिक किताबें लिख चुका है। हाफिज सईद के नाम में हाफिज लफ्ज लगा ही इसलिए क्योंकि उसको कुरान कंठस्थ है। इसलिए पाकिस्तान में "गुड तालिबान" के बारे में बात करते समय आप इस तरह से मत सोचिए कि वास्तव में वे बैड तालिबान ही होंगे।

हाफिज सईद हो कि मसूद अजहर। वे जिहाद के जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उनके मुताबिक उन्हें यह रास्ता उनकी कुरान और नबी ने ही दिखाया है। अपनी तकरीरों के दौरान वे अपनी हर बात और आतंकी वारदात को कुरान और नबी के नाम पर ही जायज ठहराते हैं। अपनी एक तकरीर में मौलाना मसूद अजहर कहता है "जब तक दुनिया में कुरान है तब तक जिहाद रहेगा।" जिहाद के लिए हथियार उठाने का विरोध करनेवाले मुसलमानों को भी वह लानत भेजता है और कहता है कि जो मुसलमान हमें गलत ठहरा रहे हैं असल में वे खुद गलत रास्ते पर हैं।

ये एक मुसलमान के लिए बहुत दुविधा की स्थिति पैदा करती है। अगर आप इंटरनेट पर मौजूद मसूद अजहर और हाफिज सईद की तकरीरों को सुनेंगे तो महसूस करेंगे कि वे अपने समर्थकों के ऊपर कुरान और नबी के नाम पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं कि कैसे वे जो कर रहे हैं या कह रहे हैं वही सुन्नत (इस्लामिक परंपरा) है। तो क्या ये लोग सचमुच वही बोलते हैं जो कुरान में लिखा है या नबी ने कहा है?

यह बहुत जटिल सवाल है और यह सवाल कोई आज पैदा नहीं हुआ है। यह सवाल मुहम्मद साहब के जाने के साथ ही पैदा हो गया था जो समय के साथ और बड़ा तथा जटिल होता गया है। इस्लाम के भीतर उभरा हर संप्रदाय इसी सवाल का जवाब पाने की प्रक्रिया में पैदा होता गया है और आज इस्लाम के भीतर फैले करीब 850 संप्रदाय इसी सवाल का जवाब दे रहे हैं कि कुरान में जो लिखा है उसका अर्थ क्या है और खुद मोहम्मद साहब की परंपरा क्या है। मौलाना मसूद अजहर और मौलाना हाफिज सईद जैसे कट्टरपंथी अतिवादियों ने इस्लाम और नबी के नाम पर कुछ तो घालमेल किया है और गैर मुस्लिमों के साथ साथ उस मुसलमान को भी अपना दुश्मन बना लिया है जिसकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं।

अगर हम केवल पाकिस्तान को देखें जो खुद को भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों का नुमाइंदा समझने की भूल करता है तो वहां भी हाफिज सईद या फिर मसूद अजहर जैसे मौलानाओं को पैदा करनेवाली विचारधारा को माननेवाले अल्पसंख्यक हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में बीते कुछ दशकों ने जो आतंकवाद देखा है उसके मूल में बहावी विचारधारा के लोग रहे हैं। यह बहुत चौंकानेवाला तथ्य हो सकता है कि भारत का दारुल उलूम देओबंद एक तरफ भारत मेें स्वतंत्रता संघर्ष का हिस्सा बनता है और टू नेशन थ्योरी को खारिज करता है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान बन जाने के बाद उसी विचारधारा को माननेवाले मदारिस मुजाहीदीन पैदा करने की फैक्ट्री बन जाते हैं। संभवत: यह धर्म में राज्य के प्रवेश का दुष्परिणाम हो लेकिन यह हुआ है।

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ईसाईयत हो कि इस्लाम दोनों के धार्मिक ठेकेदार अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं। ईसाईयत ने करीब दो सौ सालों में चर्च और प्रशासन की सीमारेखा निर्धारित कर ली लेकिन इस्लाम के लिए यह कर पाना इतना आसान नहीं है। इसलिए दुनिया के जिन देशों में प्रगतिशील सोच के साथ इस्लाम को बदलते दौर के साथ ढालने की कोशिश की गयी तो कट्टरपमथियों ने इस्लाम के नाम पर उसे असफल करने की कोशिश भी की। कहीं वे कामयाब हुए तो कहीं नाकाम लेकिन "सच्चे इस्लाम" के नाम पर न कभी बंद हुआ और न शायद कभी बंद होगा। पाकिस्तान भी इसी कशमकश में उलझा एक नया मुल्क है जहां एक तरफ करीब अस्सी फीसदी आबादी रोजमर्रा की शांतिपूर्ण जिन्दगी चाहती है और एक ऐसी  लोकतातंत्रिक व्यवस्था जो उनके लिए बेहतर जिन्दगी का अवसर उपलब्ध करा सके तो दूसरी तरफ बीस फीसद ऐसे फसादी खड़े हैं जो "सच्चे इस्लाम" को दुनिया में लाना चाहते हैं।

इन अतिवादियों के सच्चे इस्लाम का एकमात्र मकसद है सत्ता। वह सत्ता जो अभी जनता के बाथ में है, उसे वे इस्लाम के नाम पर हासिल करना चाहते हैं। पाकिस्तान में अतिवादी विचारधारा का वही वर्ग हाफिज सईद का भी समर्थक है और मसूद अजहर का भी। वही वर्ग लाल मस्जिद का भी बचाव करता है और दारुल उलूम हक्कानिया का भी। इन सबने बीते तीन चार दशक में अपनी सुविधा का एक इस्लाम गढ़ लिया है जो उनके आतंकवाद का समर्थन करता है। क्योंकि इनसे इनेमी स्टेट के रूप में भारत को काउंटर करने में पाकिस्तान के हुक्मरानों को मदद मिलती है इसलिए एक तरह से उनको पाकिस्तान सैन्य प्रतिष्ठान का भी समर्थन प्राप्त है। इसलिए ज्यादा खुशफहमी पालने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान हाफिज सईद या फिर मसूद अजहर के खिलाफ इनेमी स्टेट को खुश करने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करने जा रहा है। इसके लिए पहले दोनों मुल्कों को एक दूसरे को फ्रेन्डली स्टेट का दर्जा देना होगा। और जैसे जैसे यह काम आगे बढ़ेगा अल्पसंख्यक कट्टरपंथी विचारधारा के लोग कमजोर होते जाएंगे और जैसे जैसे वे कमजोर होंगे मौलाना मसूद अजहरों और मौलाना हाफिज सईदों या फिर मौलाना अजीजों को समर्थन मिलना अपने आप बंद होता जाएगा। फिलहाल तो आतंकवाद से निपटने का बातचीत वाला रास्ता यही है बाकी दोनों इनेमी स्टेट चाहें तो युद्ध में भी उतर सकते हैं उससे आतंकवाद तो शायद खत्म हो जाए लेकिन उनके खात्मे का वह तरीका भी उन्हीं के रास्तों की जीत होगी।

Monday, January 11, 2016

टेबल पर तालिबान

जिन तालिबों को कभी पाकिस्तान ने बंदूकें थमाकर अफगानिस्तान जंग करने के लिए भेजा था, अब उन्हीं बंदूकधारी तालिबानों को बातचीत की टेबल पर बुलाना चाहता है। बुलाना क्या चाहता है, बुला लिया है। शुरूआत घर से की गयी और नवाज शरीफ की नयी सरकार बनने के बाद 2014 में तालिबान और पाकिस्तान सरकार के बीच जो बातचीत शुरु हुई थी अब उसे अफगानिस्तान तक पहुंचा दिया गया है।

तालिबान से बात करने के लिए जिन चार देशों का स्वर्णिम चतुर्भुज बना है उसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अमेरिका के स्वाभाविक किरदारों से अलहदा एक चौथा किरदार भी शामिल किया गया है, चीन। संभवत: अफगानिस्तान के खनन कारोबार में उतरे चीन को इसलिए शामिल किया गया है कि बातचीत की टेबल पर महाशक्तियों का क्षेत्रीय संतुलन बनाकर रखा जाए। लेकिन इस बातचीत से भारत को दूर रखा गया है।

पाकिस्तान ने घर में जिस तालिबान से बातचीत शुरु की थी उसमें मौलाना शमी उल हक और मौलाना अजीज शामिल थे जो कि क्रमश: दारुल उलूम हक्कानिया और लाल मस्जिद के चीफ आफ कमांड हैं। ये सभी वार्ताकार किसी दौर में तालिबान पैदा करने की फैक्ट्री चलाते रहे हैं और आज भी उनका मकसद लोकतंत्र नहीं बल्कि इस्लामिक शरीया और खलीफा का शासन है। अपनी बातचीत में वे शायद ही शरीया और जिहाद से पीछे हटें। फिर सवाल ये है कि बातचीत के लिए पाकिस्तान यह स्वर्णिम चतुर्भुज बनाकर चाहता क्या है?

तालिबान के लिए अफगान सत्ता में हिस्सेदारी। जो मुकाम पाकिस्तान मुल्ला उमर के जरिए जंग के मैदान में हासिल करके गंवा चुका है अब वही काम वह वार्ता की टेबल पर करना चाहता है। पाकिस्तान को पंजाबी तालिबानों से आज भी कोई परेशानी नहीं है क्योंकि वे इंडिया के खिलाफ इस्तेमाल होते हैं लेकिन उसकी समस्या हैं वे अफगानी तालिबान जो आईएसआई के नियंत्रण से बाहर चले गये हैं। यही तालिबान पाकिस्तान के लिए दोहरा संकट है। एक तरफ जहां वह इन अफगानी तालिबानों के खिलाफ देश के भीतर जर्ब-ए-अज्ब की जंग लड़ रहा है तो दूसरी तरफ वह बातचीत के जरिए जहां पाकिस्तान के अफगान इलाकों में शांति प्रयास करना चाहता है तो दूसरी तरफ अफगानिस्तान में उन्हें सत्ता का हिस्सेदार बनाना है।

इस पूरी कवायद के पीछे पाकिस्तान हर लिहाज से सिर्फ अपना हित साधना चाहता है। अपनी ऐतिहासिक गलतियों सुधारने की बजाय सिर्फ पैबंद लगाकर वह समस्याओं को सुलझाना चाहता है। पाकिस्तान की तरफ से जिस तरह की चालाकियां दिखाई दे रही हैं उससे लगता नहीं है कि बातचीत की इस टेबल पर किसी का पेट भरेगा।

(फोटो: अफगान बार्डर पर सुरक्षा करता अफगान जवान)

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