Sunday, January 24, 2016

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान

एक कम्युनिस्ट पार्टी पाकिस्तान में भी है। सीपीपी। कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान। पाकिस्तानी कामरेडों का इतिहास तो है लेकिन कोई भूगोल नहीं है। अड़तालीस में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने कलकत्ता में अपनी एक शाखा आजाद हो चुके पाकिस्तान में खोलने का निर्णय लिया और उर्दू के मार्क्सवादी कवि सज्जाद ज़हीर उर्फ बन्ने मियां को पाकिस्तान में वर्गविहीन समाज के स्थापना की जिम्मेदारी मिली। बन्ने मियां के पिता अवध के चीफ जस्टिस सर सैयद वजीर हसन के बेटे थे जो कि मूल रूप से जौनपुर के निवासी थे।

कवि कॉमरेड बन्ने मियां को पाकिस्तान में एक जबर्दस्त साथी मिले, फैज अहमद फैज। दोनों ही शानदार शायर थे और दोनों भारत में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोशिएशन से जुड़े हुए थे। लेकिन पाकिस्तान में इन प्रगतिशील शायरों के साथ जबर्दस्त ज्यादतियां की गयीं और छह साल के भीतर ही समूचा प्रगतिशील आंदोलन शीलबंद कर दिया गया। 1951 में लियाकत अली खान की सरकार का तख्तापलट करने के आरोप में फैज साहब और सज्जाद जहीर सहित दर्जनों कॉमरेड नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप लगा कि वे सोवियत संघ की मदद से पाकिस्तान में तख्ता पलट करना चाहते थे।

कुछ समय बीतने के बाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तरफ से कूटनीतिक हस्तक्षेप किया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि सज्जाद जहीर सहित कुछ कॉमरेड कैद से रिहा किये गये और उन्हें भारत को सौंप दिया गया। वापस लौटकर सज्जाद जहीर ने दोबारा से प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का काम दोबारा शुरु कर दिया। उधर पाकिस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी और सारा प्रगतिशील आंदोलन छह साल की उम्र में ही कब्र में दफन हो गया।

लेकिन कब्र में करीब 58 साल दफन रहने के बाद 2013 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान के ऊपर से प्रतिबंध हटा लिया गया और अब गिने चुने कामरेडों की जमात आनलाइन दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। हालांकि अभी भी जमीन पर जीरो ताकत रखनेवाले पाकिस्तानी कॉमरेड सिर्फ बयान जारी करने तक सीमित हैं लेकिन उनके बयान भी किसी क्रांति की आहट नहीं देते। उन प्रेस विज्ञप्तियों को देखकर लगता है कि वे पाकिस्तान में कम्युनिस्म का एक इस्लामिक संस्करण विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इस बार उनके ऊपर रावपिंडी कांस्पेरिसी जैसा कोई केस न बने जिसके कारण सीपीपी को 58 साल पाकिस्तानी लोकतंत्र की कालकोठरी में गुजारने पड़े थे।

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