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Sunday, September 13, 2015

आधुनिक भारत के योगस्तंभ- स्वामी शिवानंद सरस्वती

दुनिया में बीसवीं सदी योग के प्रसार की सदी थी. योग के इस प्रसार में सैकड़ों नहीं हजारों योगियों ने चुपचाप अपना योगदान दिया और पूरी दुनिया में योग के महत्व को स्थापित किया. लेकिन बीसवीं सदी में योग के इस प्रसार को बिना स्वामी शिवानंद सरस्वती को जाने समझा नहीं जा सकेगा.

तमिलनाडु में 1887 में जन्मे स्वामी शिवानंद सरस्वती पेशे से ब्रिटिश मलेशिया में डॉक्टर थे. चिकित्सा करते करते ही उन्हें एक दिन यह महसूस हुआ कि शरीर के सब अंग तो समझ लिए लेकिन आत्मा का पता न चला? बस इतना सवाल मन में उठते ही वे आत्मा की खोज में फिर से भारत लौट आये और ऋषिकेश में स्थित हो गये. यही गुरुदीक्षा ली और यहीं से उन्होंने वह किया जिसने पश्चिमी जगत में योग की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

1936 में डिवाइन लाइफ सोसायटी की स्थापना करनेवाले स्वामी शिवानंद सरस्वती ने अपने कई शिष्यों को पश्चिम में योग प्रसार के लिए भेजा. योग और आध्यात्म पर 200 से अधिक किताबें लिखीं. करीब साठ, सत्तर साल पहले अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा में डिवाइन लाइफ सोसायटी के संरक्षण में योग प्रसार का काम शुरू हुआ जो आज तक चल रहा है.

पूरी दुनिया में योग की सबसे प्रामाणिक संस्थाओं में एक बिहार स्कूल आफ योग के संस्थापक स्वामी सत्यानंद सरस्वती स्वामी शिवानंद सरस्वती के ही शिष्य थे और पचास के दशक में उन्हें यह कहते आश्रम से विदा किया था कि "जाओ सत्यानंद दुनिया को योग सिखाओ."

आधुनिक भारत के योग स्तंभ- स्वामी राम

साठ के दशक में योग के सामने तब तो और भी कठिन दौर था वैज्ञानिक साबित होने का. क्योंकि अमेरिका के लैब में योग सफल न हुआ तो उसका पश्चिम में प्रवेश निषेध हो जाता. इसी कठिन दौर में हिमालय के एक महान योगी स्वामी राम डॉ एल्मर ग्रीन के बुलावे पर 1969 में अमेरिका जाते हैं.

मैनिन्जर फाउण्डेशन की लेबोरेटरी में उनके योग संबंधी दावों की लंबी जांच पड़ताल चलती है लेकिन स्वामी राम की पराभौतिक शक्तियों के आगे विज्ञान असंभव को संभव मान लेता है. परीक्षण के दौरान उन्होंने16 सेकेण्ड के लिए हृदय गति रोक दी लेकिन वे जिन्दा रहे और सबसे बात करते रहे. उन्होंने अपने हथेली के अलग अलग हिस्से में 11 डिग्री का तापमान अंतर पैदा करके शरीर विज्ञान के असंभव को संभव कर दिखाया.

लेकिन योग का इससे भी बड़ा एक अचंभा उन्होंने कैमरे में कैद किया. और वह था चक्र की शक्ति. शरीर के भीतर षट्चक्रों को विज्ञान कल्पना ही मानता था. लेकिन स्वामी राम ने दावा किया कि वे हर चक्र पर आभामंडल (औरा) पैदा करेंगे जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है. उनके हृदय स्थल (अनाहत चक्र) पर उभरा आभामंडल न सिर्फ कैमरे में कैद हुआ बल्कि विज्ञान के सामने पहली बार योग का षट्चक्र सिद्धांत भी साबित हुआ जो अभी तक विज्ञान में कपोल कल्पना समझा जाता था.

स्वामी राम जैसे महान योगियों के कारण आधुनिक दुनिया में योग अपनी वैज्ञानिकता सिद्ध कर सका है. योग दिवस पर स्वामी राम को शत शत नमन!

(चित्र में स्वामी राम के अनाहत चक्र (हृदय मंडल) पर उभरा आभामंडल जो कि मैनिन्जर फाउण्डेशन में दर्ज किया गया.)

आधुनिक भारत के योग स्तंभ - स्वामी कुवलयानंद

भारत में योग क्रांति और योग पुनर्जागरण की बात हो और स्वामी कुवलयानंद जी का जिक्र न हो तो जानकारी पूरी नहीं होगी.

1883 में गुजरात में जन्में स्वामी कुवलयानंद (जगन्नाथ गणेश गुने) बंबई और बड़ौदा से पढ़ाई के बाद आजादी आंदोलन का हिस्सा हो गये थे. वे श्री अरविन्द से प्रभावित थे और बाद में तिलक के होमरूल मूवमेन्ट में शामिल हो गये थे. इसी दौरान भारतीय संस्कृति का पठन पाठन करते हुए 1907 में उनका परिचय बड़ौदा के जुम्ममदादा व्यायामशाला से हुआ. यहां मानिकराव दादा ने उन्हें तीन साल शरीर के भारतीय शास्त्र से उनका शुरूआती परिचय करवाया. लेकिन उनके जीवन में योग के विधिवत प्रवेश की शुरूआत हुई 1919 में जब बड़ौदा में पहली बार उनकी मुलाकात बंगाली योगी परमहंस माधवदास से हुई. और यहां से कुवलयानंद के जीवन की दिशा बदल गयी.

स्वामी कुवलयानंद योग को आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर कसकर इसका प्रसार करना चाहते थे ताकि योग के चिकत्सकीय पहलू को लोगों के सामने लाया जा सके. इसके लिए उन्होंने 1924 में दुनिया का पहला योग रिचर्स इंस्टीट्यूट स्थापित किया जिसका नाम था कैवल्यधाम.  मुंबई पुणे के बीच में लोनावाला में स्थापित कैवल्यधाम ने एक रिसर्च मैगजीन "योग मीमांसा" का प्रकाशन भी शुरू किया जो पूरी तरह से योग के चिकत्सकीय पहलू को समर्पित है.

स्वामी कुवलयानंद का 1966 में निधन हो गया लेकिन उन्होंने जिस योग क्रांति के बीज बोये थे वे समय के साथ पल्लवित होते रहे. और आज पूरब में चीन से लेकर पश्चिम में कनाडा तक कैवल्यधाम योग पर एक प्रामाणिक संस्था के रूप में कार्यरत है. यह स्वामी कुवलयानंद ही थे जिन्होंने पहली बार योग को चिकित्सा के रूप में सामने रखा.

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